शिकायत बोल

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सोमवार, 27 जनवरी 2014

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार अधिनियम का पूरा सच
जब भी राइट ऑफ़ इनफार्मेशन की बात आती है तो कांग्रेस अपनी पीठ थपथपाती है कि हमने जनता को जानने का अधिकार दिया। क्या आपने कभी सोचा कि जिस RTI कि वज़ह से कांग्रेस सरकार का इतना भ्रष्टाचार जनता के सामने उजागर हुआ और जो RTI आज भ्रष्टाचार कि खिलाफ जनता का मज़बूत और कारगर हथियार साबित हो रहा है उसे कांग्रेस ने जनता को क्यों दिया? क्या वास्तव में कांग्रेस जनता को सूचना का स्वीकार देना चाहती थी? क्या RTI का श्रेय कांग्रेस को दिया जाना चाहिए? क्या वास्तव में कांग्रेस ने इस पर कोई काम किया था? इस सवाल का जवाब जानने के लिए राईट तो इनफार्मेशन एक्ट कि पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। 
सन २००२ में माननीय सुप्रीम कोर्ट का एक केस में फैसला आया। केस का नाम था Union of India v/s Association for democratic reforms (AIR – 2002 SC 2112) इस केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रश्न था कि क्या किसी मतदाता को अपने प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार है अथवा नहीं? इस केस के माध्यम से यह मांग की गयी थी कि जो भी व्यक्ति चुनाव में खड़ा होता है उसे अपनी समस्त जानकारी जनता को बतानी चाहिए। इसके लिए उसके द्वारा उन जानकारियों को प्रकाशित किया जाना चाहिए अथवा मांगे जाने पर उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर अपना निर्णय दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 19(1)A के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान कि गयी है और इसी अनुच्छेद के अंतर्गत ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार भी उसे प्राप्त होता है तथा इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों पर प्रतिबन्ध केवल अनुच्छेद19(2) के द्वारा ही लगाया जा सकता है, इसके अतरिक्त उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता। अतः चुनाव आयोग का यह दायित्व बनता है कि वह इस विषय पर कार्य करे और जब कोई व्यक्ति किसी प्रत्याशी के बारे में सूचना प्राप्त करना चाहे तब चुनाव आयोग उसे वह सूचना उपलब्ध करवाये तथा इससे पहले चुनाव आयोग प्रत्येक प्रत्याशी से सभी जानकारी प्राप्त करे। 
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से सूचना के अधिकार का प्राम्भ हुआ। इस निर्णय के आने के बाद देश भर में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि अब माननीय न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता को प्रत्येक प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)A में है तो क्या किसी भी चुने हुए प्रतिनिधि के बारे में जानने का अधिकार भी जनता को है? क्या किसी पब्लिक अथॉरिटी से जनता से जुड़े विषयों से सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी हमें संविधान द्वारा प्रदान किया गया है? 
उधर चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याक्षियों को यह रेगुलेशन जारी कर दिया कि आप अपनी पूरी जानकारी Affidavit के साथ आयोग में जमा करवाएं। इस बात पर हड़कम्प मच गया। सुप्रीम में कई मुकदमे गये। इस पर संसद के अंदर और बाहर चर्चा हुई। परन्तु चूंकि अनुच्छेद 19(1)A संविधान द्वारा दिया गया फंडामेंटल राईट है, और फंडामेंटल राईट पर कोई भी रेगुलेशन प्रिवेल नहीं कर सकता। अतः इस निर्णय को बदला नहीं जा सका। 
जिस समय यह निर्णय आया केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की बीजेपी NDA सरकार सत्ता में थी। उन्होंने इस निर्णय को आधार बना कर एक एक्ट पास किया जिसे कहा गया FREEDOM OF INFORMATION ACT 2002 (ACT NO. 5 OF 2003) (http://indiacode.nic.in/fullact1.asp?tfnm=200305) चूंकि ये संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन से निकला था अतः इसे FREEDOM OF INFORMATION नाम दिया गया। यह एक्ट लागु होता उससे पहले ही 2004 के चुनावों में बीजेपी चुनाव हार गयी और सत्ता से बाहर हो गयी। अब केंद्र में नयी सरकार थी, कॉंग्रेस UPA गठबंधन कि सरकार। अब चूंकि संसद द्वारा इस एक्ट को पास कर दिया गया था और देश भर में इस पर बहुत चर्चा हो गयी थी। यानि कि इस एक्ट पर इतना कार्य किया जा चूका था कि इसे अब रोक पाना मुमकिन नहीं था। परन्तु कांग्रेस ये जानती थी कि अगर इस एक्ट को इसी रूप में लागू कर दिया गया तो उन्हें इसका क्रेडिट नहीं मिलेगा। यही सोच कर उसने इस एक्ट में कुछ अमेंडमेंट्स करके इसका नाम बदल दिया और 2005 में इसे नए नाम के साथ Right to Information Act 2005 के नाम से पास कर पूरे देश में लागु कर दिया। 
अब कांग्रेस सभी से यह कहती है कि हमने जनता को सूचना का अधिकार दिया , जबकि ये पूरा सच नहीं है। सन 2003 कि जनवरी में ही Freedom of Information Act 2002 पास हो चुका था। और उसके पीछे का कारण था माननीय न्यायालय का वह निर्णय जिस पर बीजेपी सरकार ने यह एक्ट पास किया। 
लोगों में यह भ्रम पैदा किया गया कि कांग्रेस सरकार ने इस एक्ट को पास किया। और देश से भ्रस्टाचार मिटने और सुसाशन लाने के लिए इस एक्ट को लाया गया। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। 
इस एक्ट को लाने का क्रेडिट किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। यदि किसी को क्रेडिट दिया जाना चाहिए तो माननीय सर्वोच्च न्यायालाय को और उन न्यायमूर्तियों को जिन्होंने ने संविधान में प्रदत्त अधिकारों कि उचित व्याख्या की तथा तत्कालीन बीजेपी सरकार को जिसने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को आधार बना कर फ्रीडम ऑफ़ इनफार्मेशन एक्ट बनाया और संसद से पास किया, जिसे आगे चलकर सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के नाम से लागु किया गया। 
ये जो भ्रम कांग्रेस ने प्रचारित किया है, इसे तभी दूर किया जब इस सच का अधिक से अधिक प्रचार किया जाये। अब जबकि सच आप सब के सामने है तो आपसे निवेदन है कि इस सच को अधिक से अधिक प्रचारित करने में आप भी मदद करें। इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें। 
• साभार
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