शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
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रविवार, 30 सितंबर 2012

परहेज

अखबार और कार्टून



















मुद्दे की बात यह है कि हर अखबार-पत्रिका में एकाधिक कार्टून अनिवार्य रूप से छपने चाहिए। इसके लिए एक सजग पाठक और कार्टून प्रेमी होने के नाते के नाते आप जो अखबार लेते हैं उसे नियमित रूप से अलग-अलग कार्टूनिस्टों के बनाए अधिक कार्टून छापने के लिए पत्र लिखें, ई-मेल करें... लिखते रहें,करते रहें।

आज का अखबार देखा। कई बार सोचा कि विज्ञापन और पठनीय (?) सामग्री का अनुपात देखा जाए। २ रुपये से ४.५० रुपये में बदले हुए दिल्ली के दैनिक हिन्दुस्तान में आज २०+४ (मूवी मैज़िक- कुछ छोटे आकार के पृष्ठ)+१० (सर्च इंजन- वर्गीकृत/डिस्प्ले विज्ञापन)=३४ पृष्ठ हैं। कुल मुद्रित क्षेत्र (प्रिण्ट एरिया) है- लगभग ५६६८९२ वर्ग सेमी.। इसमें विज्ञापन ३३४७७.७ वर्ग सेमी क्षेत्र में छपे हैं, जब कि पठनीय (?) सामग्री २३२११.५ वर्ग सेमी. छपी है। इस तरह अखबार में लगभग ५९.०५ % विज्ञापन हैं और ४०.९५% सामग्री। यह सिर्फ़ एक अखबार के एक संस्करण की तस्वीर है।

पूरे अखबार में सम्पादकीय पृष्ठ पर एक कार्टून है। पहले पन्ने का पॉकेट कार्टून बन्द कर दिया गया है। भीतर एक कार्टून छपता है छपता है जो प्राय: गायब रहता है। फ़िल्म-टीवी और ऐसी ही तमाम सामग्री आवश्यक रूप से मौजूद रहती है- पाठकों की रुचि के नाम पर। रविवारीय अंक का पहले इन्तज़ार रहता थ, उसे प्राय: संजोकर रखा जाता था। और अब, रविवार को मैं सबसे पहले अपने अखबार के परिशिष्ट ‘मूवीमैज़िक’ को अखबार से निकालकर दूर रख देता हूं। एक पाठक के नाते मैं ऐसा कर सकता हूं।

क्या साधन सम्पन्न इस अखबार में देश के कुछ कार्टूनिस्टों के गैर राजनीतिक यानी पारिवारिक सामाजिक नहीं छापे जा सकते! कमोवेश यही हाल देश के अन्य छोटे-बड़े अखबारों का भी है। सभी ‘पाठकों की पसन्द’ की सामग्री छाप रहे हैं और पता नहीं इन्हें पाठकों की पसन्द पता कैसे चलती है?

मुद्दे की बात यह है कि हर अखबार-पत्रिका में एकाधिक कार्टून अनिवार्य रूप से छपने चाहिए। इसके लिए एक सजग पाठक और कार्टून प्रेमी होने के नाते के नाते आप जो अखबार लेते हैं उसे नियमित रूप से अलग-अलग कार्टूनिस्टों के बनाए अधिक कार्टून छापने के लिए पत्र लिखें, ई-मेल करें... लिखते रहें,करते रहें।

हो सकता है आपको लगे मैं स्वार्थी हूं और मैं अपनी बात थोप रहा हूं। बिल्कुल, मैं स्वार्थी हूं- कार्टून, कार्टून कला और कार्टूनिस्टों के हित में (इनमें मैं भी शामिल हूं) मुझे यह भी स्वीकार है! आप साथ हैं तो आप और हम मिलकर स्थिति बदल सकते हैं।

(ऊपर दिए आंकड़े अनुमानित हैं इन्हें मानक न मानें- बस थोड़ी जानकारी साझा करने के लिए सिर खपाई की गयी है।)

• कार्टूनिस्ट चन्दर

शिकायत बोल
कार्टून न्यूज़ हिन्दी

सोमवार, 27 अगस्त 2012

चूल्हा


जरूरी नहीं गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा खरीदना
कोई गैस एजैन्सी उपभोक्ता को नये कनेक्शन के साथ अपने यहां से 
गैस चूल्हा खरीदने को विवश नहीं कर सकतीं।
गैस एजेन्सियां नया गैस कनेक्शन लेने पर उपभोक्ता को अनिवार्य बताते हुए गैस चूल्हा भी खरीदने को विवश करती हैं, ऐसी शिकायतें प्राय: सुनने-देखने को मिलती हैं। अब आईओएल, एचपीसीएल और बीपीसीएल ने अपने वितरकों से से ऐसा न करने को कहा है। हमारे यहां ईंडेन, एचपी गैस और भारत नाम से रसोई गैस उपलब्ध कराई जाती है। नया गैस कनेक्शन मिलने पर सम्बन्धित एजेन्सी लगभग हर उपभोक्ता को अपने यहां से गैस स्टोव या चूल्हा खरीदने को विवश करती है जो बाज़ार से काफ़ी महंगा (और प्राय: हल्का भी) होता है। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता को गैस एजेंसी से बिना चूल्हा खरीदे गैस कनेक्शन न देने की बात लिखकर देने को जोर देना चाहिए।
कोई गैस एजेन्सी ऐसा लिखकर देने को तैयार नहीं होगी। गैस कनैक्श लेने के लिए अधिक उतावलापन न दिखते हुए सम्बन्धित गैस कम्पनी से एजैन्सी की लिखित शिकायत करनी चाहिए। उललेखनीय है कि कोई गैस एजैन्सी उपभोक्ता को नये कनेक्शन के साथ अपने यहां से गैस चूल्हा खरीदने को विवश नहीं कर सकतीं।
 कुछ साल पहले मुझे जब ईंडेन का गैस कनेक्श न मिला ता सम्बन्धित गैस एजेंसी ने अपने यहां से गैस चूल्हा खरीदने के लिए मुझ पर काफी दवाब डाला। मेरे सामने आये 2 उपभोक्ताओं को काफी महंगा गैस चूल्हा भेड़ दिया गया। चूल्हा खरीदने की अनिवार्यता के बारे में लिखित में देने को गैस एजेंसी तैयार नहीं हुई। मुझसे धीरे से कहा गया कि चूल्हा साथ बेचने से कुछ आमदनी हो जाती है। गैस कनेक्शन और सिलेण्डर की सप्लाई पर कमीशन बहुत कम है। मुझे बाजार से खरीदे गयेआईएसआई मार्क वाले गैस चूल्हे की रसीद की रसीद दिखने को कहा गया। रसीद दिखाने पर एजेंसी का कर्मचारी चूल्हे की जांच करने मेरे घर भी आया जिसका शुल्क मुझे देना पड़ा।
• ईंडेन http://indane.co.in/    https://iocl.com/Products/indanegas.aspx 
• भारत गैस http://www.ebharatgas.com/
• एचपी गैस http://www.hindustanpetroleum.com

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

राज्य पक्षी गौरैया

गौरैया को मिला दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्ज़ा
















गौरैया को अपने घर और आसपास उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के मामले में हमें भी थोड़ा प्रयास करना चाहिए। घने छायादार पेड़ लगाएं जो गौरैया को आश्रय दे सकें। कच्ची जमीन नहीं हो तो छोटे-बड़े गमलों में पेड़-पौधे लगाएं। गमलों की जगह पेट या प्लास्टिक की बोतल-डिब्बों को काटकर उनका उपयोग भी किया जा सकता है। फ़ूल वाले पौधे भी इनके लिए उपयुक्त होते हैं। इन पर बैठने वाले कीट-पतंगे गौरैया का आहार भी बनते हैं। एक मिट्टे के बरतन में पक्षियों के लिए साफ़ पानी रखा जा सकता है और रोटी के टुकड़े, ब्रेड, दाल, चावल, गेहूं, बाजरा आदि अनाज दाने के रूप में डाले जा सकते हैं।
देर से ही सही एक अच्छा निर्णय सामने आया है। दिल्ली की मुख्य मन्त्री शीला दीक्षित ने स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व सन्ध्या पर घरेलू पक्षी गौरैया को राज्य पक्षी का दर्ज़ा देने की घोषणा कर दी। प्रदेश में गौरिया जैसे हर जगह दिखने वाले पक्षी का दिखना ही काफ़ी कम हो गया है। इसके पीछे तेजी से बढ़ता शहरीकरण, घटती हरियाली, मकानों के जंगल, बढ़ती आबादी, दाने-पानी के अनुपल्ब्धता, लोगों की उदासीनता आदि की ही प्रमुख भूमिका है।
जानेमाने पर्यावरणविद दिलावर के नेतृत्व में मुम्बई की संस्था नेचर फ़ॉ एवर सोसायटी ने गौरैया को बचाने के अभियान की पहल की है। हमारे यहां लोकगीतों में यह सीधासाधा पक्षी सदा रहा है। बच्चे और बड़े इसके दीवाने रहे है और गौरैया कवि-लेखकों की रचनाओं में पर्याप्त महत्व के साथ उपस्थित रही है।
गौरिया को प्राकृतिक या उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है। तभी यह पक्षी दिखाई देता रहेगा। चिड़ियों को दाना और पानी रखने पर लोगों को फ़िर ध्यान देना होगा। इसमें कुछ विशेष खर्च नहीं आता, बस थोड़ा सा ध्यान देने और ध्यान रखने से बात बन जाएगी। यह जिम्मेदारी बच्चों को सौंप दी जाए तो वे बड़े उत्साह और चुस्ती से उसे निभाते हैं।
घर-आंगन में सुबह से ही चहकना-फ़ुदकना शुरू कर देने वाली छोटी सी गौरैया एक घरेलू पक्षी है। १५-१६ सेण्टी मीटर लम्बी गौरैया एशिया के अलावा मध्य यूरोप, दक्षिणी अफ़्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अमरीका, न्यूज़ीलैण्ड आदि में भी पायी जाती है। गौरैया पर हुए शोध में यह  चिन्ताजनक बात सामने आयी है कि इस पक्षी की संख्या में तेजी से कमी आयी है जो ६०-८० प्रतिशत है। प्रकृति के संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
पर्यावरणविद दिलावर के प्रयास से २० मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। राजधानी में उन्हीं के प्रयास से राइज़ फ़ॉर द स्पैरोज़ अभियान शुरू हुआ है। ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी ऑफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स ने गौरैया को रेड लिस्ट में शामिल किया है। 
घरों में आंगन, हरियाली, बगीचे और पेड़-पौधे खत्म होते जाना गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आया है। इनके घोंसलों के लिए जगह मिलना दूभर हो गया है। घर में यदि गौरैया कहीं घोंसला बना ले तो सफ़ाई पसन्द आधुनिक के रंग में रंगे लोग इनके घोंसले को साफ़ करने से भी नहीं हिचकते। मिलावटी, रासायनिक खादयुक्त दाना और गन्दा पानी भी इनके जीवन में ज़हर घोलते आ रहे हैं। 
जगह-जगह लगे मोबाइल फ़ोन टावर, बिजली के तार-खम्भे वगैरह भी इनके लिए अशुभ सिद्ध हुए हैं। मोबाइल फ़ोन टावर से उत्पन्न होने वाला रेडिएशन से इनकी प्रजनन क्षमता कम हुई है।
अब गौरैया को संरक्षण देने के सही प्रयासों की आवश्यकता है। यह सिर्फ़ सरकार, संस्थाओं या लोगों की ही नहीं सभी की जिम्मेदारी है कि थोड़ा सा ध्यान इस मासूम पक्षी की ओर भी दें। दिल्ली में बच्चों की शिक्षा में गौरैया का पाठ शामिल किया जाएगा। दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में पक्षियों के बारे मे विस्तृत अध्ययन हेतु कॉमन बर्ड  मॉनीटरिंग प्रोग्राम भी तैयार किया जाएगा।
गौरैया को अपने घर और आसपास उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराने के मामले में हमें भी थोड़ा प्रयास करना चाहिए। घने छायादार पेड़ लगाएं जो गौरैया को आश्रय दे सकें। कच्ची जमीन नहीं हो तो छोटे-बड़े गमलों में पेड़-पौधे लगाएं। गमलों की जगह पेट या प्लास्टिक की बोतल-डिब्बों को काटकर उनका उपयोग भी किया जा सकता है। फ़ूल वाले पौधे भी इनके लिए उपयुक्त होते हैं। इन पर बैठने वाले कीट-पतंगे गौरैया का आहार भी बनते हैं। एक मिट्टे के बरतन में पक्षियों के लिए साफ़ पानी रखा जा सकता है और रोटी के टुकड़े, ब्रेड, दाल, चावल, गेहूं, बाजरा आदि अनाज दाने के रूप में डाले जा सकते हैं। हर २-४ दिन बाद पानी के बरतन को साफ़ किया जाना चाहिए। घर मे लम्बी बेल या पेड़ हो तो गौरैया स्वत: आने-रहने लगेंगी। घर में कोई ऐसा स्थान भी गौरैया को उपलब्ध कराया जा सकता है जहां वह अपना घोंसला बनाकर रह सके। भूलकर भी उसका घोंसला उजाड़ने का पाप नहीं करना चाहिए।
गौरैया के बारे में और जानें- गौरैया  घरेलू गौरैया   फिर आओ प्यारी गौरैया  ओ री गौरैया...बनी दिल्ली की राज पक्ष
गौरैया.. विलुप्त प्रजातियों की सूची में  शहरों से गायब हो रही गौरैया

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

१५ अगस्त

कितने तिरंगे 
१५ अगस्त, २०१२- सहयात्रा की असीम मंगलकामनाएं!  

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

अण्णा पार्टी

अण्णा पार्टी का वाहन जुगाड़
देश का लोकप्रिय बहुउपयोगी वाहन जुगाड़
























सुना है अण्णा पार्टी अपने लोगों को आरामदेह महंगी कारें नहीं खरीदने देगी। आवश्यकतानुसार सुपात्रों को एक-एक बहुउपयोगी ‘जुगाड़’ नामक लोकप्रिय वाहन उपलब्ध कराएगी/खरीदने या तैयार कराने को प्रेरित करेगी। इस डीज़ल चालित लोकप्रिय वाहन के लिए रजिस्ट्रेशन, बीमा, रोड टैक्स आदि की आवश्यकता नहीं। साथ ही इसका रखरखाव भी सस्ता है।
अण्णा के लोग इससे सवारी ढोने, सिंचाई, माल ढोने जैसे विभिन्न कार्यों करते हुए आत्म निर्भर और ईमानदार भी बने रह सकते हैं। जन प्रतिनिधि बहुत कम खर्च में अपने क्षेत्र में आ-जा सकेंगे...चुनाव प्रचार के लिए तो यह बहुत उपयोगी वाहन है। सबसे अच्छी बात- यह भारतीय सड़कों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त वाहन है।
• टी.सी. चन्दर

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

क्रॉस


शहीद भगत सिंह की मूर्ति  के पीछे  क्रोस 
आगरा के पेठा मार्केट भगत सिंह द्वार (नूरी दरवाजा) में स्थापित है अमर शहीद भगत सिंह की मूर्ति, लेकिन यह समझ से परे है कि मूर्ति के पीछे  क्रोस कैसे लग गया? क्या उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था या किसी चर्च ने इस स्थान के निर्माण में पवित्र योगदान दिया है? बगल में ही ठलुए ताश खेलने का आनन्द ले रहे  हैं।

बुधवार, 20 जून 2012

खुदरा मूल्य

खुदरा मूल्य की औकात
एमआरपी बेमतलब
१३० रुपये के कागज का अधिकतम
अंकित खुदरा मूल्य: २१० रुपये
हाल ही में मैंने ए-४ आकार का कागज़ का पैकिट १३० रुपये देकर खरीदा जिस पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) २१० रुपये अंकित है। यह क्या बदमाशी है। ग्राहक की एमआरपी के नाम पर भी ठगाई। 
अब भी दुकानदार पर ही निर्भर है कि वह ग्राहक को सामान कितने में दे। एमआरपी की सीमा भी इसमें बाधक नहीं है। अनेक वस्तुएं एमआरपी से अधिक दाम पर भी बिक रही हैं। लेना है तो लो वरना खिसको... 
सरकार कहती है- जागो ग्राहक जागो! 
चौकीदार भी कहता है- जागते रहो!

सोमवार, 18 जून 2012

सावधान

Do not respond to calls from +375
सावधान: +375 से आने वाली कॉल उठाने पर आपके कट सकते हैं 20 रुपये
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी खास मोबाइल नंबर से आने वाली कॉलों के प्रति सावधानी बरतनें को कहा जा रहा है। इससे पहले भी अंतराष्‍ट्रीय नंबरों की कॉल रिसीव करने पर लोगों की जेब खाली हो जाया करती थी। अब दुबारा से +375 कोड से शुरू होने वाले नंबर लोगों की परेशानी का सबब बना हुआ है।
जैसे ही +375 नंबर से आने वाली मिस कॉल में पलटकर कोई बैक कॉल करता है तो उसके खाते से 15 से लेकर 20 रुपए तक कट जाते हैं। दूसरी तरफ से कॉल रिसीव तो हो जाती है मगर आपको अश्‍लील आवाजें तथा बातचीत सुनाई देगी। इसी साल जनवरी में वोडाफोन ने अपने ग्राहकों को ऐसी कॉल्‍स को नजर अंदाज करने को कहा था।
पिछली बार जब भारत में मोबाइल उपभोक्‍ताओं को अंतरराष्ट्रीय नंबरों से लॉटरी की धोखाधडी से संबंधित कॉल आती थीं। इस तरह की खबरें भारत में भले ही नई हों मगर पश्चिमी देशों में यह काफी पुरानी है। तो अगली बार अगर आपके फोन पर +375 कोड वाले नंबर से कोई कॉल आए तो जरा संभल कर रिसीव करें।
साभार: हिन्दी गिज़्बॉट