शिकायत बोल

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ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
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शनिवार, 20 सितंबर 2014

टोल बोल

टोल टैक्स नाके यानी टॉर्चर नाके

• रघु ठाकुर

केन्द्रीय परिवहन मंत्री श्री नितिन गड़करी ने संसद में टोल टैक्स के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण घोषणायें की हैं:-
१. उन्होंने कहा कि निर्माण की लागत खर्च की पूर्ति होते ही टोल टैक्स वसूली बंद की जायेगी।
२. सरकार अग्रिम टोल टैक्स भुगतान की योजना के बारे में भी विचार कर रही है ताकि टोल टैक्स नाकों पर लंबी-लंबी लाईनें न लगें।
नि:सन्देह उनकी ये दोनों घोषणाएं पुरानी व्यवस्था से कुछ
आगे जाने वाली है और जनता के टोल टैक्स दर्द पर हल्की सी मरहम लगाने वाली हैं। परन्तु क्या यह वास्तव में यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के अनुकूल है? क्या ये घोषणायएं गॉंंव व शहर के बीच के विभेद को दूर करने वाली हैं? और क्या इनसे कोई बड़ा बदलाव हासिल हो सकेगा? इन दृष्टिकोणों से विचार करना होगा।
दरअसल टोल टैक्स नाकों का निर्माण और टोल टैक्स की कल्पना कहने को सरकार के पीपीपी मॉडल की संतान है जिसे सार्वजनिक व निजी भागीदारी की कल्पना कहा जाता है और इस योजना के नाम पर सरकारों ने सड़क निर्माण के काम को निजी हाथों में देने का षड़यंत्र रचा था। आजादी के बाद से यह आम धारणा रही है कि सस्ता यातायात उपलब्ध कराना, आम जनता को सड़क बनाकर देना आदि कार्य सरकार के दायित्व हैं परन्तु वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के दौर में सरकार ने बड़ी चतुराई के साथ मीठे शब्द जाल बांध कर सड़क निर्माण के काम को निजी क्षेत्र को सौंप दिया। अब सरकारें सड़क निर्माण के लिये टेण्डर मंगाती है जिन्हें बड़े-बड़े ठेकेदार भरते हैं, फिर सरकार परदर्शिता के साथ अपने सहयोगी या सहभागी ठेकेदारों को इस चतुराई व कौशल के साथ दिला देती है कि आरोप लगाना तो दूर उनकी मिलीभगत की भनक न लग पाये।
इस योजना के तहत सरकार ने यह तय किया है कि ७५-७५ किमी. से कम के खण्ड की सड़कें बनाने के टेण्डर निकाले जाएंगे और यह इसलिये होता है क्योंकि ठेकेदार ऐसा ही चाहते हैं। इसका दूरगामी असर यह होता है कि सड़क निर्माण के बाद जब संबंधित ठेकेदार टोल टैक्स के लिये नाके शुरू करता है तो एक ही सड़क पर कई टोल टैक्स के नाके लग जाते हैं। उदाहरण के लिये अगर भोपाल से इंदौर जाना हो तो फिलहाल ३ और कुछ समय बाद 4 टोल टैक्स के नाके लग जायेंगे। एक-एक कार या जीप गाड़ी वाले को एक तरफ़ से लगभग १५०-२०० रुपये टोल टैक्स में देना होता है। यानी लगभग १ रुपया प्रति कि.मी. की टोल टैक्स की दर हो जाती है। अगर रेल में यात्रा करना हो तो सामान्य श्रेणी मे ३०-४० पैसे प्रति किमी., स्लीपर क्लास में ७०-८० पैसे प्रति किमी. कुल किराया लगता है। जबकि टोल टैक्स १ रूपया प्रति किमी. के आसपास हो जाता है। बसों और ट्रकों को जो टोल टैक्स देना पड़ता है वह तो आने-जाने पर हजारोें रुपये हो जाता है और अंततः उसे आम आदमी को या तो यात्री बस किराये के रूप में या माल भाड़ा वृद्धि के रूप में देना पड़ता।
महानगरों में बड़े पैमाने पर सड़कें व फ्लाई ओवर बनाये जा रहे हैं जिन पर हजारों करोड़ रुपया खर्च हो रहा है परन्तु वहॉं कोई टोल टैक्स नही लगता। देश की राजधानी दिल्ली में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बने हैं परन्तु उनके लिये कोई टोल टैक्स नही हैं क्योंकि उन्हे सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास मिशन के नाम पर बनाया है।
इसको तो जरूर सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने इस योजना का नाम जवाहर लाल जी के नाम से ठीक रखा है क्योंकि जवाहर लाल देश के विकास का मतलब महात्मा गॉंधी की राय के विपरीत शहरों का विकास मानते थे और यही कल्पना उनकी योजना में भी थी। हालांकि उन्होंने भी अपने कार्यकाल में गॉंवों को विकास की कसौटी भले ही न माना हो परन्तु इतनी तो कृपा की ही थी कि गॉंंव कस्बों की सड़कों का निर्माण सरकारी पैसों से होता था, पीपीपी से नही होता था। और सड़क के बदले में वसूली के लिये टोल टैक्स नाके नही थे। वैसे भी एक कल्याणकारी राज्य में सड़कों का निर्माण और रखरखाव सरकार का दायित्व होता है। आने-जाने के मामले में यह बुनियादी जरूरत है। सड़क कोई उद्योग नही है और इसलिए अच्छा होता कि श्री गड़करी जी नयी शुरूआत करते तथा सड़क निर्माण देशी विदेशी ठेकेदारों की पूंजी से कराकर जनता की जेब पर डाका डालने की इस दस्यु नीति को बदलकर कल्याणकारी नीति को लाते।
टोल टैक्स इसलिए भी गलत है कि यह वाहन मालिकों या जनता के ऊपर लगाया गया एक ही सुविधा का दूसरा टैक्स है। मोटर व्हीकल्स एक्ट के अनुसार हर वाहन क्रेता को रोड टैक्स देना होता है और अगर रोड ही नही है तो रोड टैक्स किस बात का? परन्तु सरकार अपने कानूनी डंडे का इस्तेमाल कर सड़क निर्माण के नाम पर पहले रोड टैक्स लेती है और फिर उसी सड़क के निर्माण के लिये निजी पूंजी लगाने वाले ठेकेदारों को बुलाकर उनकी पूंजी के बदले में मयब्याज और मुनाफा की वसूली टोल टैक्स से कराती है।
नैतिक आधार पर सरकार को जहॉं रोड टैक्स ले लिया गया है, वहॉं सड़कों का निर्माण स्वतः कराना चाहिए और अगर नयी सड़कों का निर्माण हो रहा है तो फिर रोड टैक्स के रूप में लिया गया पैसा वापिस करना चाहिए। परन्तु वैश्वीकरण के दौर में सरकारें स्वतः वैश्य बन गई हैं यानी व्यापार करने वाली बन गयी हैं और वे जनता के साथ व्यापार कर रही हैं। ठेकेदार या उद्योगपति वे धनपति होते हैं जो पूंजी के बदले में जनता से पैसा वसूलते हैं और सरकार ऐसी साहूकार बन गयी है जो निर्वाचन का लबादा ओढ़कर लोकतंत्र का दंड हाथ में लेकर कानून के कारतूस से जनता को लूटती है।
इन टोल टैक्स नाकों में वसूली के तरीके, गुंडई के तरीके बन गये हैं। ठेकेदारों ने आसपास के बाहुबलियों को थोड़े से पैसों के लिये अपना वसूली कर्मचारी बनाया है और वे वसूलीकर्ता समूहबद्ध होकर यात्री या वाहन चालकों की अकेलेपन की कमजोरी का फायदा उठाकर जितना मर्जी आये उतना टैक्स वसूलने हैं। गॉंंव के बेचारे किसान लोग जो दस-बीस लोग एकत्रित होकर, अपने एक-एक, दो-दो बोरी अनाज मंडी में बेचने को जाते हैं, वे रात में, ठंड, बरसात में, दिन में, तपती दोपहरी में घंटो गिड़गिड़ाते खड़े या पड़े रहते हैं।
सत्ताधीशों से मिलीभगत होने के कारण ठेकेदारों के इन बाहुबलियों का मनोबल इतना बढ़ चुका है कि अब उन्होंने आमजन से बढ़कर जपप्रतिनिधियों और यहॉं तक कि विधायकों तक को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है। हाल ही में म.प्र. के मुरैना के विधायक व पूर्वमंत्री और स्वतः पुलिस के आईजी रहे श्री रूस्तम सिंह को न केवल बाहुबलियों का शिकार होना पड़ा बल्कि उनकी रिर्पोट पर भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नही की। इसके पहले दो और विधायकों के साथ ऐसी घटनायें घट चुकी हैं, जहॉंं वे अपने परिवार के साथ टोल टैक्स नाके पर से गुजरते समय पिटाई और अपमान के शिकार हुए। म.प्र. की विधानसभा के सत्तापक्ष के एक विधायक को उनकी पत्नी व बच्चों के सामने टोल टैक्स के बाहुबलियों ने पीटा, उन्हें चोटें भी आई और यहॉं तक कि वे विधानसभा में आकर रोये परन्तु उनके ऑंंसू भी सरकार के मुखिया के मन को न छू सके। टोल टैक्स के ठेकेदारों और शासन के सत्ताधीशों के संबंध कितने गहरे हैं यह इस घटना से स्पष्ट हो जाता है।
इन टोल टैक्स नाकों पर गााड़ियों के रूकने से यात्रा का समय बढ़ जाता है और जो गाड़ी आसानी से 3 घंटे में भोपाल से इंदौर पहुंच सकती है, उसे औसतन 30-40 मिनिट का समय ज्यादा लगता है। इतना ही नही गाड़ियों का ईधन खर्च भी बढ़ जाता है। एक विशेषज्ञ ने मुझे बताया कि जितने पेटोल या डीजल के खर्च पर गाड़ी 400 कि.मी. जा सकती है, टोल टैक्स नाके और सड़कों की भीड़ की वजह से वह गाड़ी उतने ही ईधन में मुश्किल से 300 कि.मी. जाती है। यानी हर 300 कि.मी. की यात्रा में एक-एक गाड़ी का 100 कि.मी. की यात्रा के बराबर औसतन 5-6 लीटर पेट्रोल या डीजल ज्यादा खर्च होता है। और इसका राष्टीय अध्ययन किया जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर शायद हजार भी नहीं लाख करोड़ रुपये का ईंधन जिसे हम विदेश से आयात करते है, इस प्रकार बरबाद हो जाता है।
विशेषज्ञ का यह भी कहना था कि बार-बार गाड़ी के बंद करने व शुरू करने से गाड़ी के इंजिन पर भी असर पड़ता है। पर इतना तो तय है कि टोल टैक्स पर खड़ी या जाम और भीड़ में फॅंसी गाड़ियॉं जब लगातार खड़े-खड़े धुंआ उगलती हैं तो लाखों लोग उस धुंए को पीने को लाचार होते हैं और अस्थमा जैंसी बीमारी को लाचार होते हैं. सड़कों के किनारे की फसल पर भी इसका प्रभाव पड़ता है. याने अगर टोल टैक्स और पी.पी.पी. का चलन समाप्त कर सरकारें संविधान के अनुकूल कार्य करें तथा टोल टैक्स हटा दें तो देश के आम आदमी के लाखों-करोड़ों रुपये बच सकता है. प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है। यात्रा की अवधि कम हो सकती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जो गति बढ़ाना चाहते हैं, वह गति बढ़ सकती है तथा आमजन से लेकर विधायक तक जो टोल टैक्स नाकों (जो वस्तुतः टारचर टैक्स नाके बन गये हैं) में पिटाई व अपमान से बच सकते हैं।
साभार
लिन्क: रविवार.कॉम
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• ता.च. चन्दर
इसी प्रकार दिल्ली से आगरा का इकतरफ़ा केवल एक कार का टोल टैक्स लगभग ३०० रुपये है। वहीं (खतरनाक) यमुना एक्सप्रेस वे पर १६५ किमी. के लिए टोल टैक्स ३२० रुपये है। समय की बरबादी अलग- कभी कम और कभी ज्यादा। और मज़ाक देखिए, राजस्थान में दौसा की तरफ़ जाते हुए भीतरी रास्ते में एक १५-२० फ़ुट की गली नुमा सड़क पर इधर-उधर २ ड्रम रखकर बनाये गये ‘टोल’ पर बिना रसीद के १० रुपए देने पड़े। नाना प्रकार की पार्किंग  के नाम पर लिया जाने वाला शुल्क भी किसी लूट से कम नहीं है।
yamuna express way
 Exemption from payment of fee
No fee shall be levied and collected from a mechanical vehicle:
Transporting and accompanying:
The President of India;
The Vice – President of India;
The Prime Minister of India;
The Chief Justice of India;
The Governors;
The Lieutenant Governors;
The Chief Ministers;
The Presiding Officers of Central and State Legislatures having jurisdiction;
The Leader of Opposition in Lok Sabha, Rajya Sabha and the State Legislatures having jurisdiction;
The Judges of Supreme Court;
The Chairman of the Legislative Council of the State;
The Speaker of the Legislative Assembly of the State;
The Chief Justice of High Court;
The Judges of High Court;
The Ministers of Govt. of India;
Ministers of GoUP;
Secretaries and Commissioners of GoUP;
Foreign dignitaries on State visit;
Heads of Foreign Missions stationed in India using cars with CD symbol;
All Government vehicles;
Vehicles used for official purpose by:-
The Ministry of Defence including those which are eligible for exemption in accordance with the provisions of the Indian Toll (Army and Air Force) Act, 1901 and rules made there under, as extended to Navy also;
The Central and State armed forces in uniform including para military forces and police;
An executive Magistrate on duty;
The persons required to use the Expressway for discharging their statutory obligations in relation to the Site;
A fire fighting department or organization;
Officers of Concerned Expressway Authority; and
Vehicle used as ambulance
.....................................................................
Vehicle CategoryTill AligarhTill MathuraTill AgraFor Round Trip
Two wheeler50100150280
Car/Jeep/Van100220320510
LCV/Mini-Bus150350500800
Bus/Truck30070010501680
Multi-axle Vehicle350105016002560
7+ axle Vehicle60014002100
3360

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

लूट

अस्पतालों की लूट-पाट 
महंगा इलाज नहीं सीधीसीधी लूट                            • फ़ोटो: विशाल
भारत के अस्पताल और डाॅक्टर रोगियों को किस बुरी तरह लूटते हैं, इस बारे में कुछ तथ्य अभी सामने आये हैं। रोगियोंकी शल्य-चिकित्सा के समय जो भी उपकरण उनके शरीर में लगाये जाते हैं, उन्हें दुगुने-तिगुने दामों में बेचा जाता है। रोगी या उसके परिजन मजबूर होते हैं। वे क्या करें? अस्पताल या डाक्टर जो भी बिल बनाकर दे देता है, वह उन्हें भरना पड़ता है। अभी पता चला है कि हृद-रोग से पीड़ितों को जो ‘स्टेन्ट’ लगाया जाता है, उसपर अस्पताल ६० हजार रु. से १ लाख रु. तक मुनाफा कमाते हैं। वे रोगी से कहते हैं कि यह यंत्र तो हमने विदेश से मंगाया है। क्या करें, यह डाॅलर में खरीदना पड़ता है। आपको पता ही है कि डाॅलर तो रुपए की तुलना में लगभग ६० गुना भारी होता है। बेचारा रोगी यह कैसे पता करे कि अस्पताल ने वहउपकरण कौनसी कंपनी से मंगाया, कितने में मंगाया और कब मंगाया।
कई बार कई मियाद बाहर उपकरण भी रोगियों को चिपका दिए जाते हैं। रोगियों को यह भी बता दिया जाता है कि विदेशी उपकरण ही सर्वश्रेष्ठ हैं। भारत में बने उपकरण का कोई भरोसा नहीं। रोगी को अपना घर या जेवर या जमीन बेचना पड़े लेकिन वह अस्पताल की इस ठगी का शिकार हुए बिना नहीं रह पाता। जो लोग गरीब हैं (इनकी संख्या १०० करोड़ के आस-पास है), उनके पास बेचने केलिए कुछ नहीं होता है। उन्हें कर्ज भी कौन देगा? वे अपना इलाज़ कराने की बजाय अपना सिर मृत्यु की दहलीज़ पर टिका देते हैं। चिकित्सा-जैसे पवित्र-व्यवसाय को इतना अधःपतन हो रहा है और हमारी सरकार सोई हुई है। जैसे दवाइयों की कीमतों पर कुछ नियंत्रण लागू हुआ है, वैसे ही इन चिकित्सा-उपकरणों की कीमतों पर नियंत्रण की व्यवस्था तुरन्त क्यों नहीं करती? जरुरी यह है कि देश में चिकित्सा और शिक्षा सर्वसुलभ हो। इसके लिए या तो इन दोनों का पूर्ण सरकारीकरण हो या फिर स्कूल-कालेजों और अस्पतालों पर इतना कड़ा नियंत्रण हो कि वे किसी को ठग न सकें। आजकल पढ़ाई और दवाई, दोनों में नैतिकता शून्य होती जा रही है। वे सिर्फ पैसा कमाने का धंधा बन गए हैं। धंधों में फिर भी कुछ नैतिक नियमों का पालन होता है लेकिन पढ़ाई और दवाई के क्षेत्रों में जैसी लूटमार और ठगी का माहौल बन गया है, वह दुनिया के ‘सबसे पुराने धंधे’ को भी मात करता हुआ दिखाई पड़ रहा है।
• डॉ. वेद प्रताप वैदिक 
(साभार)

सोमवार, 15 सितंबर 2014

तेल

हिन्दी की हिन्दी में हिन्दी
देखिए, यह कैसी हिन्दी है एक सिर तेल बेचू कम्पनी की (सौजन्य- सम्बन्धित विज्ञापन एजेंसी और दैनिक हिन्दुस्तान, नयी दिल्ली)-

‘दुनिया की सब
महंगा तेल ने 
दिया धोका!
आखिर में सिर्फ़
अश्विनी ही बाल
गिरना रोका।’

परम्परा

पशु वध
मेनका जी या (मानेका) और इस सरकार को रोकता कौन है पशु वध पर रोक लगाने से। जंगल अब भी खूब कट रहे हैं- लक्ड़ी का फ़र्नीचर खूब बन-बिक रहा है। ट्रक भरभर कर लकड़ी आ रही है। पशु वध कड़ाई से रोको, जंगल बचाओ और लोगों को मांसाहार के नुकसान बताते हुए शाकाहारी बनने को प्रेरित करो। जब धूम्रपान-तम्बाकू-गुटखा के मामले में कड़े कदम उठा सकते हैं तो इस मामले में क्यों नहीं। गलत परम्पराएं बन्द भी की जा सकती हैं। ध्वनिविस्तारक (लाउडस्पीकर), रेडियो-टीवी-फ़िल्म, मोबाइल फ़ोन, कम्प्यूटर आदि तमाम चीजें किसी परम्परा का अंग नहीं हैं पर दशकों से उपयोग में लाई जा रही हैं। तो क्या कुर्बानी/बलि/ त्यौहार/आहार के लिए पशु वध/बलि की परम्परा को सख्ती से बन्द नहीं किया जा सकता। दरअसल एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो पशु धन को नष्ट करके अपना धन्धा जमाए हुए है। मांस, चमड़े आदि की खपत-निर्यात से यह वर्ग भरपूर कमाई करता है।....कहने को बहु
त कुछ है पर किसे समझाएं, जिन्हें समझाना चाहते हैं वे सभी ‘छंटे’ हुए समझदार हैं।

• कार्टूनिस्ट चन्दर

बुधवार, 3 सितंबर 2014

रसोई गैस

ग्राहक बना बेचारा 
द्वापर युग के चक्रव्‍यूह से भी अधि‍क पेचीदगी वाला है कुकिंग गैस वि‍रतण तंत्र। आगरा में कुकि‍ग गैस वि‍तरण व्‍यवस्‍था अवि‍श्‍वसनीयता के दौर में पहुंच गयी है। एक ओर इस पर न तो भारत सरकार के कार्यदायी उपकृम ही नि‍गरानी करने की स्‍थि‍ति‍ में हैं और न ही दूसरी ओर समाजवादी सरकार के नागरि‍क अपूर्ति‍ व्‍यवस्‍था से जुडा तंत्र। बुकिंग के लि‍ए इस्‍तेमाल में आ रहा साफ्टवेयर टैम्‍परि‍ग का शि‍कार है। आप कई ट्रायल में अगर गैस का सि‍लेण्डर बुक करवाने में कामयाब भ्‍ाी हो गये तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि‍ आपके पास सि‍लेण्डर पहुंच ही जाए। यह बात अलग है कि‍ मोबाइल पर एसएमएस का आना जरूर बना रहेगा। 
जब डि‍लीवरी का मैसेज आये दो दि‍न बीत जायेंगे तब आप थो़ड़े परेशान होकर जब डीलर के पास पहुंचेंगे तो कम्‍प्‍यूटर के करसर को एक-दो बार क्‍लि‍क करके वह कहेगा कि‍ कल आपको आपका सि‍लेंडर मि‍ल जायेगा।   गैस कंपनि‍यां करवाये सर्वेक्षण आप तो असंगठि‍त उपभोक्ता होने के कारण भले ही बेवजह के झगडे़ से बचने के लि‍ये चुप होकर बैठ जाये कि‍न्‍तु इंडि‍यन आइल और भारत पैट्रोलि‍यम के सेल्‍स और पीआरओ विभागों को खामोश होकर नहीं बैठना चाहि‍ए। लगातर सर्वेक्षण करवाने पर मि‍ले पब्‍लि‍क फीडबैक के आधार पर उन आपराधि‍क तत्‍वों के प्रति‍ सख्‍ती करनी चाहि‍ए जो आम उपभोक्‍ता को समय से गैस सि‍लेण्डर पहुंचाये जाने की जिम्मेदारी से बचने के लिए साफ्टवेयर में बेखौफ टैम्‍परिंग कर रहे हैं। 
इस मामले में पुलि‍स की साइबर सैल खास उपयोगी साबि‍त हो सकती है, संसाधनों की दृष्‍टि‍ से तकनीकी रूप से गडबडी़ करने वालों तक पहुंचने में पूरी तरह सक्षम है। वर्तमान में आगरा में आम उपभोक्‍ता पूरी तरह से असंगठि‍त है और उसके सामने वि‍तरण तंत्र का एक ऐसा चक्रव्‍यूह है जि‍समें घुसकर नि‍कलना द्वापर युग से भी कई गुना मुश्‍कि‍ल है।
• राजीव सक्सेना
आगरा/फ़ेसबुक

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

वाहन

पुरानी जुगाड़
राजधानी में पुलिस-ट्रेफ़िक पुलिस की नाक के नीचे ऐसी तमाम रेहड़ियां चल रही हैं जो अक्सर मुझे ही नहीं और तमाम लोगों को भी दिख जाती हैं। इनमें स्कूटर का इंजिन, एक पहिया और हैण्डिल होता है। भारी वजन लादकर भी यह अच्छी गति से चलती है। न पंजीकरण, न ड्रायविंग लायसेन्स, न प्रदूषण प्रमाण पत्र वगैरह चाहिए। बस पेट्रोल भरो, जन सेवा करो। खेद की बात यह है कि इस रेहड़ी में सरकारी गैस कम्पनी ’भारत’ गैस के सिलेण्डर लदे हैं- घर-घर वितरण के लिए। यह तय है कि ऐसी रेहड़ियां यूं ही नहीं चल रहीं भले ही कभी लोगों को इसकी बड़ी कीमत न चुकानी पड़े।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

नेशनल हैरल्ड

नेशनल हेराल्ड मामला और सुब्रमण्यम स्वामी के आरोप
सोनिया गांधी और राहुल गांधी को दिल्ली की एक अदालत ने समन भेजा है। नेशनल हेराल्ड अखबार केस में सुब्रह्मणयम स्वामी की याचिका पर ये समन भेजा गया है। ये केस नेशनल हेराल्ड अखबार के कब्जे से जुड़ा हुआ है। स्वामी का आरोप है कि कांग्रेस के पैसे से नेशनल हेराल्ड को एक नई कंपनी बनाकर खरीदा गया।
क्या है नेशनल हेराल्ड मामला
•नेशनल हेराल्ड की स्थापना देश के पहले प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने १९३८ में की थी। २००८ में समाचार पत्र बंद हो गया था। ये कंपनी नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज़ का प्रकाशन करती थी| यंग इंडियन नामक निजी कंपनी ने नेशनल हेराल्ड की संपत्ति का अधिग्रहण कर लिया। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले को कोर्ट में लेकर चले गए। सोनिया गांधी और राहुल गांधी यंग इंडियन कंपनी में निदेशक हैं।
•सोनिया गांधी और राहुल गांधी के कंपनी में ७६ फीसदी शेयर हैं।
•अन्य शेयर कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नाडिस के हैं। स्वामी ने कहा कि यह विश्वासघात का गंभीर मामला है।
•अगर सोनिया गांधी दोषी पाई गई तो उन्हें सात साल की जेल हो सकती है। उन्हें ट्रायल का सामना करना होगा। उन्हें बतौर आरोपी समन भेजा गया है। उनके खिलाफ प्रथम दृष्ट्या सबूत हैं।
सुब्रमण्यम स्वामी के आरोप
•सुब्रमण्डयम स्वामी का आरोप है कि एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड का अधिग्रहण करने के लिए कांग्रेस के नेताओं ने यंग इंडियन कंपनी को बिना ब्याज के ऋण दिया।
•नेशनल हेराल्ड का मालिकाना हक एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड के पास था। स्वामी का आरोप है कि यंग इंडियन ने एसोसिएट जर्नल्स की ५०० करोड़ रूपए की संपत्ति हड़पने की अनुमति दी। इसके लिए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के ९० करोड़ रूपए के फंड का इस्तेमाल किया गया।
•स्वामी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर फर्जी कंपनी चलाने और सरकारी सुविधाओं का दुरूपयोग करने का आरोप लगाया। स्वामी ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की थी। स्वामी का आरोप है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने सरकारी फर्म को निजी कंपनी में तब्दील करवा दिया और १६०० करोड़ रूपए की प्रोपर्टी हड़प ली।
•स्वामी के मुताबिक एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड के पास नेशनल हेराल्ड और कौमी आवाज समाचार पत्र का मालिकाना हक है। इस कंपनी की उत्तर प्रदेश और दिल्ली में बेशकीमती प्रोपर्टी है। स्वामी का कहना है कि यंग इंडियन की डील फर्जी थी। इसमें कई कानूनों का उल्लंघन हुआ है।
•२०१२ में सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पर निशाना साधा था और नेशनल हेराल्ड वाली कंपनी के अधिग्रहण पर सवाल खड़े किये थे और कहा था कि इस कंपनी को कांग्रेस ने ९० करोड़ से ज्यादा का ऋण दिया था|
•स्वामी ने कहा कि एसोसिएट जर्नल्स को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति से बिना प्रतिभूति के ९० करोड़ रुपये से ज्यादा का ऋण मिला और उनका दावा है कि आयकर अधिनियम के तहत यह अवैध है क्योंकि राजनैतिक पार्टियाँ व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऋण नहीं दे सकतीं|
•आयकर अधिनियम की धारा १३ए और आरपीए की धारा २९ए में राजनीतिक दलों को किसी कंपनी को बिना ब्याज या ब्याज के साथ कर्ज देने का कोई प्रावधान नहीं है।’
•कांग्रेस पार्टी की ओर से ९० करोड़ का बिना जमानत का कर्ज दिया गया था, जबकि कानूनन कोई पार्टी किसी कंपनी को कर्ज नहीं दे सकती
•स्वामी का आरोप है कि कांग्रेस के कारण यंग इंडियन ने बोर्ड में प्रस्ताव लाकर सिर्फ ५० लाख रुपये में ऋण खत्म कर दिया और एसोसिएट जर्नल को शेयरों के हस्तांतरण के जरिये यंग इंडिया को बेच दिया जो अखबार या पत्रिका बेचने वाली कंपनी नहीं है|
•सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि सोनिया और राहुल ने सेक्शन २५ के तहत एक कंपनी की शुरुआत की थी जिसे यंग इंडिया नाम दिया गया| इनमे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का शेयर ३८-३८ फीसदी था|
•स्वामी के मुताबिक ‘यंग इंडिया’ नाम की कंपनी बना कर न सिर्फ दिल्ली, लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में अखबार के लिए सस्ती दर पर उपलब्ध करवाई गई जमीन पर कब्जा कर लिया, बल्कि इस दौरान कई कानूनों का भी जम कर उल्लंघन किया।
•राहुल गांधी की कंपनी ने दिल्ली के आइटीओ के पास अखबार चलाने के लिए दी गई कीमती जमीन पर बने ‘हेराल्ड हाउस’ को किराए पर दे दिया। जिस पर तत्कालीन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इसी बिल्डिंग में पासपोर्ट सेवा केंद्र का उद्घाटन किया, जिसके लिए नई कंपनी को सरकार मोटा किराया दे रही है।
•इस कंपनी ने रजिस्ट्रार को दी गई जानकारी में माना है कि कंपनी के शेयर धारकों की बैठक सोनिया गांधी के सरकारी आवास दस जनपथ में हुई। जबकि कानूनन सरकारी आवास का काम किसी व्यावसायिक काम के लिए नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस की ओऱ से जवाब- 
•नंवबर २०१२ में सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों का जवाब देते हुए कांग्रेस ने स्प

ष्ट किया कि हमारे लिए राजनीतिक विचारधारा क्या है यह सिर्फ हम तय करेंगे.
•कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जनार्दन दिवेदी ने कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास की याद दिलाते हुए कहा था कि प. जवाहर लाल नेहरू एक साधारण नेता नहीं थे.
•दिवेदी ने कहा कि एसोसिएट प्रेस नेशनल हेराल्ड अखबार ने नेहरू और गांधी की विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया है. और कांग्रेस ने हमेशा एसोसिएट प्रेस की मदद की है.
•कांग्रेस का कहना था कि हेराल्ड के बेरोजगार हो रहे कर्मचारियों की मदद करके कांग्रेस ने अपने राजनीतिक धर्म का निर्वहन किया.
•कांग्रेस ने स्वामी के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि कांग्रेस ने जिस समय हेराल्ड ग्रुप की मदद किया उस समय वह घोर संकट के दौर से गुजर रही थी.
•उस समय उसके ३०० कर्मचारी सिर्फ दिल्ली से, ३०० कर्मचारी लखनऊ और कुल मिलाकर इससे ७०० कर्मचारी बेरोजगार हो रहे थे. ऐसे में कांग्रेस ने उन्हें ९० करोड़ का लोन देकर अपने राजनीतिक धर्म का निर्वहन किया है.
•सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा नई कंपनी यंग इंडिया बनाने और एसोसिएटेड जर्नल का अधिग्रहण करने के सवाल पर कांग्रेस का कहना था कि, ‘इस प्रकार की धारणा बनाई जा रही है कि यंग इंडिया ने द एसोसिएटेड जर्नल को अधिग्रहित किया और अब यह वाणिज्यिक उद्यम बनेगा।’ उन्होंने कहा, ‘एसोसिएटेड जर्नल का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है।
•यंग इंडिया को केवल इसकी हिस्सेदारी मिली है। कोई भी संगठन तब तक अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है जब तब वह अपने उद्देश्यों को पूरा करता है।’

धर्मान्तरण

मंदिर में बदल गया चर्च 

वाल्मीकि समुदाय के 72 लोग हिंदू धर्म में लौटे

• इरम आगा, अलीगढ़
अलीगढ़ में सेवंथ डे एडवेंटिस्ट्स से जुड़ा एक चर्च रातोरात शिव मंदिर में तब्दील हो गया। 1995 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बने वाल्मीकि समाज के 72 लोगों ने फिर से हिंदू धर्म अपना लिया। जिस चर्च में पहले क्रॉस लगा था, उसे हटाकर वहां पर शिव की तस्वीर लगा दी गई है। हिंदू संगठन इसे 'घर वापसी' करार दे रहे हैं।
मंगलवार को अलीगढ़ से 30 किलोमीटर दूर असरोई में चर्च के अंदर व्यापक स्तर पर शुद्धिकरण किया गया। 19 साल पहले ईसाई बने 72 लोगों ने हिंदू धर्म अपना लिया। बताया जा रहा है कि इस चर्च में लगे क्रॉस को हटाकर गेट के बाहर रख दिया गया है और अंदर शिवजी की तस्वीर लगा दी है। जैसे ही इन लोगों के एक बार फिर हिंदू धर्म स्वीकार करने की खबर फैली, इलाके में तनाव फैलना शुरू हो गया। लोकल इंटेलिजेंस यूनिट मौके पर पहुंच गई। कुछ ग्रामीणों ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि अब शिव की तस्वीर को भी हटाकर एक घर में रख लिया गया है।
संघ प्रचारक और धर्म जागरण संगठन के प्रमुख खेम चंद्र ने कहा, 'इसे धर्मांतरण नहीं, घर वापसी कहते हैं। वे अपनी मर्जी से हिंदू धर्म छोड़कर गए थे और जब उन्हें लगा कि उन्होंने गलती की है, तो वे वापस आ गए।' 72 वाल्मीकियों के पुनर्धर्मांतरण पर खेम ने कहा, 'हम उनका स्वागत करते हैं। हम अपने समाज को बिखरने नहीं देंगे, हमें इसे समेटकर रखना होगा।' खेम ने कहा कि ये लोग कई सालों से ईसाई धर्म मान रहे थे। मैं इनसे कई बार मिला और इनसे अपने फैसले पर एक बार फिर से विचार करने को कहा।
एक बार फिर हिंदू धर्म में लौटे अनिल गौड़ का कहा है, 'हम जाति व्यवस्था से परेशान थे और इसी वजह से हमने अपना धर्म बदला था। लेकिन हमने पाया कि ईसाइयों के बीच भी हमारी स्थिति कुछ ठीक नहीं है। हिंदू थे, तब हमारा कोई स्तर नहीं था और हमें छोटे काम करने तक सीमित रहना पड़ता था। 19 साल तक हम ईसाई रहे, लेकिन हमने पाया कि वे भी हमारी कम्यूनिटी की मदद करने नहीं आए। बड़े दिन की कोई सेलिब्रेशन नहीं होती थी। बस मिशनरियों ने एक चर्च बना दिया। और कुछ नहीं।'
चर्च में शिव की तस्वीर लगाते युवक।
78 साल के राजेंद्र सिंह कहते हैं कि वह वापस हिंदू धर्म में आकर बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, 'एक दिन मैं चर्च के बाहर सोया था कि मुझे पैरालिसिस का अटैक हो गया। मैं हिल तक नहीं पा रहा था। मुझे यह पिछले साल हुआ था। तब से लेकर आज तक मैं सोच रहा हूं कि यह मुझे माता देवी ने सजा दी है अपना विश्वास छोड़ने के लिए।'
अलीगढ़ में वकील और ईसाई समुदाय के नेता ओजमंड चार्ल्स इन बातों से सहमत नहीं होते। उन्होंने कहा, 'घर वापसी मुझे एक साजिश लगती है। कभी हम 'लव जिहाद' का शोर सुनते हैं और अब 'घर वापसी' की बात हो रही है। क्या यह हिंदू राष्ट्र बनाने के संकेत हैं? सिटी मेथडिस्ट चर्च के फादर भी इस खबर से नाराज दिखे। उन्होंने कहा, 'यह शुद्धिकरण पूजा उस चर्च के अंदर हुई, जो सेवंथ डे एडवेंटिस्ट्स से जुड़ा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। विश्वास व्यक्तिगत मामला है लेकिन चर्च के अंदर हवन नहीं।'
इस बीच असरोई गांव में अगर कोई किसी से पुनर्धर्मांतरण के बारे में पूछता है, तो लोग अपने घरों मे चले जाते हैं तो कुछ कहते हैं कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं मालूम। साथ ही इलाके में पुलिस की मौजूदगी से लोगों में बेचैनी बढ़ गई है।
सौजन्य: नवभारत टाइम्स