शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
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बुधवार, 27 अगस्त 2014

बर्गर

मैकडोनल्ड में मिले फंगस लगे ब्रेड
एक ब्रेड के पैकेट को जैसे ही खोला गया तो उसमें फंगस मिला। इसके बाद सात सौ ब्रेड देखे गये तो सब में फंगस ही मिले। 
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फंगस लगे ब्रेड की जांच करते अधिकारी
इलाहाबाद में इंटरनैशनल ब्रैंड मैकडोनल्ड में फंगस लगे ब्रेड का बर्गर मिल रहा है। खाद्य विभाग की टीम ने जब इस मैकडोनल्ड में छापा मारा तो सैकड़ों की संख्या में फंगस लगे ब्रेड मिले। इसी ब्रेड का बर्गर बनाकर ग्राहकों को सप्लाइ किया जा रहा था।
सोमवार की रात को खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग के सिविल लाइंस स्थित मैकडोनल्ड रेस्ट्रॉन्ट में छापे के दौरान 780 फंगस लगे ब्रेड मिले। रेस्ट्रॉन्ट में मौजूद तमाम ग्राहकों ने यह नजारा देखा, तो उनके लिए भी विश्वास करना मुश्किल हो रहा था। फंगस लगे ब्रेड देखकर ज्यादातर लोगों ने खाना छोड़कर चले जाना ही ठीक समझा।

खाद्य सुरक्षा और औषधि विभाग के अधिकारी हरिमोहन की अगुवाई में मैकडोनल्ड में जिस समय टीम जांच के लिए पहुंची, उस समय रेस्ट्रॉन्ट पूरी तरह से भरा हुआ था। टीम ने खाने-पीने की वस्तुओं का निरीक्षण शुरू किया तो उनकी नजर ब्रेड के पैकेटों पर पड़ी।
इन ब्रेड पर सितंबर माह की एक्सपायरी डेट पड़ी थी। एक ब्रेड के पैकेट को जैसे ही खोला गया तो उसमें फंगस मिला। इसके बाद सात सौ ब्रेड देखे गये तो सब में फंगस ही मिले। खाद्य विभाग ने ब्रेड का नमूना लिया और फिलहाल मैकडोनल्ड को नोटिस जारी कर दिया है।
सौजन्य- लिन्क: नवभारत टाइम्स | Aug 27, 2014

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

धर्मान्तरण

यह क्या-क्यों हो रहा है भैया
कश्मीर घाटी में २० साल पहले ५०% हिंदू थे, आज एक भी हिंदू नहीं बचा ! केरल में १० साल पहले तक ६०% जनसंख्या हिन्दुओ की थी, आज सिर्फ १०% हिंदू केरल में है। कहां गये वे हिन्दू ? पूर्वोत्तर यानी नॉर्थ-ईस्ट (सिक्किम, नगालैंड, मिजोरम, असम आदि) में हिन्दुओं का तेजी से धर्मपरिवर्तन होता रहा हैं। हिंदू हर रोज मारे या भगाए जाते रहे हैं। उन्हें सुरक्षा नहीं मिली।
देश की राजधानी में भी मिशनरियां बड़े चालाकी भरे अन्दाज़ में सक्रिय हैं। अब अनेक सालों से धर्मान्तरण करने वाले व्यक्ति का जाति नाम या उपनाम नहीं बदला जाता। जैसे पहले धर्मान्तरण के बाद राम लुभाया चौधरी का नाम राम लुभाया डिसूजा या जॉर्ज वगैरह हो जाता था। अब उसका नाम राम लुभाया चौधरी ही बना रहेगा। 
गम्भीर हालत में अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों की स्थिति और भावनाओं का शोषण करते हुए ४-६ मिशनरी के लोग प्रार्थना करते हैं। कुछ ही देर में प्रार्थना में ‘परमेश्वर" शामिल हो जाते हैं। यदि मरीज ठीक हो गया तो ये लोग उसके घर जाकर प्रार्थना करने पर जोर देते हैं। ज्यादातर लोग मान जाते हैं क्योंकि मरीज उनकी प्रार्थना से ही ठीक हुआ है- ऐसा उन्हें बताया जाता है। कई मामलों में धर्मान्तरण कराने में सफ़लता मिल जाती है। तमाम बड़े अस्पतालों में ड्यूटी कर रहे नर्सिंग स्टाफ़, वार्ड ब्वाय और डॉक्टरों में बड़ी संख्या धर्मान्तरित पूर्वोत्तर राज्यों व दक्षिण भारतीयों (केरल, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश आदि) की है। ये और अस्पताल स्टाफ़ के कुछ लोग भी मिशनरियों को पर्याप्त सहयोग देते हैं। ये लोग अपने अभियान की सफ़लता हेतु हिन्दू देवी-देवताओं का नाम शामिल करना भी नहीं भूलते।
यहां लिखे का मैं स्वयं प्रमाण हूं। (चित्र: साभार)

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

गौवंश

गौ माता
गाय को माता मानने वाले लोग एक खास वर्ग की तरफ नफरत की भावना से भी देखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन लोगों के ‘अपने’ ही सबसे ज्यादा गौ हत्याएं करते हैं। जी हां, सड़कों पर आप इधर-उधर घूमती जिन गायों को देखते हैं, उन्हें इसलिए आवारा छोड़ दिया गया होता है क्योंकि वे किसी काम की नहीं होतीं। जो गायें प्रजनन नहीं कर पातीं या बूढ़ी हो जाती हैं उन्हें बोझ समझा जाने लगता है। गायों को दूध के लिए पालते हैं लोग। अब अगर गाय दूध नहीं देगी, तो फिर वो उनके किस काम की? इसलिए इन ‘नकारी’ माताओं को लावारिस छोड़ दिया जाता है। ये माताएं सड़कों पर कूड़े के ढेर में मुंह मारती हैं और लोगों की गालियां सुनते हुए, मार खाते हुए इधर से उधर भागती रहती हैं। थक हारकर एक दिन ये माताएं दर्दनाक मौत मर जाती हैं। यह भी तो गौ हत्या ही है, फर्क बस इतना है कि हत्या के बाद इनका मांस नहीं खाया जाता।
हैरानी इस बात की है कि यह सब गाय को माता मानने वालों की आंखों के सामने होता है। कहीं गाय की हत्या होती है, तो लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। क्या सड़क पर ये मंजर देखकर उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती? अगर वे गाय को माता मानते हैं, तो गाय की ऐसी दुर्गति कैसे देख सकते हैं? क्या यही है मां के लिए उनकी इज्जत? मैं जानती हूं कि इन सवालों के जवाब में वे लोग अपनी मजबूरियां गिनाएंगे। गाय को लेकर सिर्फ राजनीति ही नहीं होती, गोरखधंधा भी चलता है। गाय की सेवा के नाम पर न जाने कितने सदन, समितियां, संस्थाएं वगैरह बनी हैं, लेकिन वे गायों के लिए कुछ भी नहीं करतीं। सच यह है कि हम अपनी जीवन में दोहरे मापदंड अपनाते हैं। गाय को माता मानना भी इसका एक उदाहरण है। स्वार्थ है तो गाय माता है, वरना एक जानवर।

• अनिल ठाकुर/फ़ेसबुक



शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

आज सुबह

हम कब सुधरेंगे 
आज काफ़ी दिनों के बाद निकट के जनकपुरी जिला उद्यान यानी डिस्ट्रिक्ट पार्क (दिल्ली में ही) जाकर डेड़-दो घण्टे बैठने का अवसर मिला। जमकर ऑक्सीजन का सेवन किया। एक सप्ताह पहले तक घर पर मशीन/सिलेण्डर का उपयोग करना पड़ रहा था। यह देखकर कष्ट होता है कि हम खुद को बदल नहीं पाते। या कहें कि ’कौन देखता है!’ सोचकर उचित-अनुचित कुछ भी करते रहते हैं। अब देखिए, पार्क साफ़ सुथरा हो तो अच्छा लगता है। अपने घर में हम ऐसा क्यों नहीं करते? वह हमारा घर है इसीलिए न! यहां थैलियां, गिलास, नाना प्रकार के पाउच आदि कूड़ा-कचरा तो है ही, लोगों ने इसे दारूबाजी का अड्डा भी बना डाला है। एक सेवा (शायद) निवृत सज्जन पास ही खुले आम निवृत हो रहे हैं। यहां कुत्तों द्वारा मस्ती मारना तो मामूली बात है। हम कब सुधरेंगे/बदलेंगे...शायद कभी नहीं...
युवा पीढ़ी का फ़ुटबाल प्रेम

रविवार, 29 जून 2014

जल आगरा

जल-कल मोदी
सि‍कन्‍दरा जलकल की लोहामंडी और हलवाई की बगीची सहि‍त कई जोनल पम्‍पि‍ग स्‍टेशनों को पानीपहुंचाने वाली मुख्‍य पाइप लाइन के क्‍लैंप दो दि‍न से जलसंस्‍थान और जल नि‍गम के इंजीनि‍यर नहीं लगा पा रहे हैं। इससे दो में से केवल एक पाइप लाइन से ही पानी की अपूर्ति‍ हो पा रही है।बडे क्षेत्र में पानी नहीं पहुंच रहा हे तीन दि‍न से। इस काम में पैसा भी बहुत खर्च हो चुका हे और और काम भी नहीं हुआ है।
जल संस्‍थान का नौसखि‍या अधि‍कारी तंत्र कभी यमुना नदी में पानी की कमी के शि‍गूफे को छोड काम चला रहा है और कभी टोरेंट द्वारा बि‍जली की सप्‍लाई नहीं देने की बात कह रहा है। यही नहीं परेशान जनता का 'हर हर मोदी घर घर मोदी' कह कर भाजपा को जि‍ताने का मजाक सा भी उडा रहे हैं। पार्षदों से कह रहे हैं मेयर से बात करो।  जो भी हो,  तीन दि‍न से जनता प्‍यासी है, एक एक बूंद पानी की कि‍ल्‍लत है। रमजान शुरू हो चुका है, पानी की इन दि‍नों कुछ ज्‍यादा ही कि‍ल्‍लत होती है। इस स्‍थि‍ति‍ में एक दम बदलाव आ सकता है अगर कलैक्‍टर/ जि‍लाधि‍ाकरी यदि‍ ये नहीं हो तो दर्जा प्राप्‍त भी अगर जलसंस्‍थान जोन टू की वाटर सप्‍लाई की समीक्षा करने को समय नि‍काल सके। 'जल संस्‍थान का 'घर घर मोदी..... ' और नगर वि‍कास मंत्री आजम खां से बात करने की एडवाईजरी से जारी करने वाला स्‍टाफ घर घर पानी पहुंचाने के अभि‍यान में खुद ही जुट जायेगा।
• फ़ेसबुक में राजीव सक्सेना

सोमवार, 27 जनवरी 2014

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार अधिनियम का पूरा सच
जब भी राइट ऑफ़ इनफार्मेशन की बात आती है तो कांग्रेस अपनी पीठ थपथपाती है कि हमने जनता को जानने का अधिकार दिया। क्या आपने कभी सोचा कि जिस RTI कि वज़ह से कांग्रेस सरकार का इतना भ्रष्टाचार जनता के सामने उजागर हुआ और जो RTI आज भ्रष्टाचार कि खिलाफ जनता का मज़बूत और कारगर हथियार साबित हो रहा है उसे कांग्रेस ने जनता को क्यों दिया? क्या वास्तव में कांग्रेस जनता को सूचना का स्वीकार देना चाहती थी? क्या RTI का श्रेय कांग्रेस को दिया जाना चाहिए? क्या वास्तव में कांग्रेस ने इस पर कोई काम किया था? इस सवाल का जवाब जानने के लिए राईट तो इनफार्मेशन एक्ट कि पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। 
सन २००२ में माननीय सुप्रीम कोर्ट का एक केस में फैसला आया। केस का नाम था Union of India v/s Association for democratic reforms (AIR – 2002 SC 2112) इस केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रश्न था कि क्या किसी मतदाता को अपने प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार है अथवा नहीं? इस केस के माध्यम से यह मांग की गयी थी कि जो भी व्यक्ति चुनाव में खड़ा होता है उसे अपनी समस्त जानकारी जनता को बतानी चाहिए। इसके लिए उसके द्वारा उन जानकारियों को प्रकाशित किया जाना चाहिए अथवा मांगे जाने पर उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर अपना निर्णय दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 19(1)A के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान कि गयी है और इसी अनुच्छेद के अंतर्गत ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार भी उसे प्राप्त होता है तथा इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों पर प्रतिबन्ध केवल अनुच्छेद19(2) के द्वारा ही लगाया जा सकता है, इसके अतरिक्त उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता। अतः चुनाव आयोग का यह दायित्व बनता है कि वह इस विषय पर कार्य करे और जब कोई व्यक्ति किसी प्रत्याशी के बारे में सूचना प्राप्त करना चाहे तब चुनाव आयोग उसे वह सूचना उपलब्ध करवाये तथा इससे पहले चुनाव आयोग प्रत्येक प्रत्याशी से सभी जानकारी प्राप्त करे। 
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से सूचना के अधिकार का प्राम्भ हुआ। इस निर्णय के आने के बाद देश भर में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि अब माननीय न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता को प्रत्येक प्रत्याशी के बारे में जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)A में है तो क्या किसी भी चुने हुए प्रतिनिधि के बारे में जानने का अधिकार भी जनता को है? क्या किसी पब्लिक अथॉरिटी से जनता से जुड़े विषयों से सम्बंधित जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी हमें संविधान द्वारा प्रदान किया गया है? 
उधर चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याक्षियों को यह रेगुलेशन जारी कर दिया कि आप अपनी पूरी जानकारी Affidavit के साथ आयोग में जमा करवाएं। इस बात पर हड़कम्प मच गया। सुप्रीम में कई मुकदमे गये। इस पर संसद के अंदर और बाहर चर्चा हुई। परन्तु चूंकि अनुच्छेद 19(1)A संविधान द्वारा दिया गया फंडामेंटल राईट है, और फंडामेंटल राईट पर कोई भी रेगुलेशन प्रिवेल नहीं कर सकता। अतः इस निर्णय को बदला नहीं जा सका। 
जिस समय यह निर्णय आया केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की बीजेपी NDA सरकार सत्ता में थी। उन्होंने इस निर्णय को आधार बना कर एक एक्ट पास किया जिसे कहा गया FREEDOM OF INFORMATION ACT 2002 (ACT NO. 5 OF 2003) (http://indiacode.nic.in/fullact1.asp?tfnm=200305) चूंकि ये संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन से निकला था अतः इसे FREEDOM OF INFORMATION नाम दिया गया। यह एक्ट लागु होता उससे पहले ही 2004 के चुनावों में बीजेपी चुनाव हार गयी और सत्ता से बाहर हो गयी। अब केंद्र में नयी सरकार थी, कॉंग्रेस UPA गठबंधन कि सरकार। अब चूंकि संसद द्वारा इस एक्ट को पास कर दिया गया था और देश भर में इस पर बहुत चर्चा हो गयी थी। यानि कि इस एक्ट पर इतना कार्य किया जा चूका था कि इसे अब रोक पाना मुमकिन नहीं था। परन्तु कांग्रेस ये जानती थी कि अगर इस एक्ट को इसी रूप में लागू कर दिया गया तो उन्हें इसका क्रेडिट नहीं मिलेगा। यही सोच कर उसने इस एक्ट में कुछ अमेंडमेंट्स करके इसका नाम बदल दिया और 2005 में इसे नए नाम के साथ Right to Information Act 2005 के नाम से पास कर पूरे देश में लागु कर दिया। 
अब कांग्रेस सभी से यह कहती है कि हमने जनता को सूचना का अधिकार दिया , जबकि ये पूरा सच नहीं है। सन 2003 कि जनवरी में ही Freedom of Information Act 2002 पास हो चुका था। और उसके पीछे का कारण था माननीय न्यायालय का वह निर्णय जिस पर बीजेपी सरकार ने यह एक्ट पास किया। 
लोगों में यह भ्रम पैदा किया गया कि कांग्रेस सरकार ने इस एक्ट को पास किया। और देश से भ्रस्टाचार मिटने और सुसाशन लाने के लिए इस एक्ट को लाया गया। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। 
इस एक्ट को लाने का क्रेडिट किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। यदि किसी को क्रेडिट दिया जाना चाहिए तो माननीय सर्वोच्च न्यायालाय को और उन न्यायमूर्तियों को जिन्होंने ने संविधान में प्रदत्त अधिकारों कि उचित व्याख्या की तथा तत्कालीन बीजेपी सरकार को जिसने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को आधार बना कर फ्रीडम ऑफ़ इनफार्मेशन एक्ट बनाया और संसद से पास किया, जिसे आगे चलकर सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के नाम से लागु किया गया। 
ये जो भ्रम कांग्रेस ने प्रचारित किया है, इसे तभी दूर किया जब इस सच का अधिक से अधिक प्रचार किया जाये। अब जबकि सच आप सब के सामने है तो आपसे निवेदन है कि इस सच को अधिक से अधिक प्रचारित करने में आप भी मदद करें। इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें। 
• साभार
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