शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
फ़ेसबुक पर

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

सावधान

जहर से बचाएं बच्चों को
अपने बच्चों को विदेशी कंपनी Johnson & Johnson के जहरीले उत्पादो से बचाएं! और उन हरामखोर डाक्टरों से भी बचें जो इस कंपनी से मिलने वालों टुकड़ो की खातिर आपके बच्चो की जान को दांव पर लगा देते हैं, आपको इस कंपनी के उत्पाद इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं !
देखें-
http:// www.youtube.com/ watch?v=hBXx2ROl CBg
आप इन सब की जगह ये करिए
बादाम का तेल छोटे बच्चों की मालिश के लिए बहुत लाभदायक होता है इसके अलावा सरसों, नारियल का तेल या आयुर्वैदिक तेल (डाबर, बैद्यनाथ , पतंजलि आदि कंपनियो के) से भी मालिश कर सकते है। मालिश सदैव हलके हाथ से ही करनी चाहिए। मालिश तेल थपथपा कर एकदम धीरे हाथ से करनी चाहिए। यदि आप स्वयं अपनी मालिश कर रही हैं तो हलके हाथ से मांसपेशियों पर दबाव डालकर सदा नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें। मालिश और खाने के बीच भी करीब घंटे भर का अन्तराल जरूरी है। खाना खाने के तुरंत बाद मालिश करेंगे तो बच्चे को उलटी की आशंका होती है।
बच्चों की त्वचा बड़ों की तुलना में काफी नाजुक होती है और बाजार मे जो भी बच्चो वाले साबुन आदि मिलते है वे कैमीकल से बनते है आप बच्चों को नहलाने के लिए दूध, दही, आयुर्वैदिक साबुन (बिना कैमीकल वाला, पंचगव्य से बना) का इस्तेमाल करें। 
टेल्कम पाउडर का प्रयोग न करना शिशु के लिए बेहतर है क्योंकि अनेक बार असावधानीवश सांस के माध्यम से पाउडर शिशु के फेफड़ों में चला जाता है जो शिशु के लिए नुकसानदायक हो सकता है और पाउडर में कई जहरीले कैमीकल भी डाले जा रहे है जो नुकसानदायक है।
• साभार
• स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

रविवार, 19 जनवरी 2014

धोखा

पेट्रोल पंप वालों का धोखा
• हर पेट्रोल पंप में पेट्रोल के लिए १ लीटर २ लीटर के नाप होती है सो वहां प्राय: १-२ लीटर में चोरी नहीं करते। इसलिए वे सैटिंग करते है १०० रुपये में २०० रुपये में ५०० रुपये में जिस से उनकी चोरी कभी पकड़ में नहीं आती क्यों कि १०० रुपये का पेट्रोल हम कभी नाप नहीं कर सकते या उसका हिसाब नहीं जोड़ते इसलिए वे कम पेट्रोल की सैटिंग हमेशा १०० २०० ३०० ५०० १००० में ही करते हैं।
• आपसे निवेदन है के जब भी आप पेट्रोल भरवाएं आप १०५ रुपये २०५ रुपये या एक लीटर २३३ रुपये ऐसे ऑड फिगर में भरवाएं तो आपको कभी भी कम पेट्रोल नहीं मिलेगा।
• कर के देखिए आपका फायदा अवश्य होगा।
• यह सुझाव जनहित में है सो इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना न भूलें।
सौजन्य: स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

अमानवीयता

गौ-हत्या का अर्थशास्त्र 
• सोनिया गौड़
• भारत में गाय का मांस 120/- रुपये किलो खुलेआम बिक रहा है.
• एक गाय-भैंस-बैल के कटने पर लगभग 350 किलो मांस निकलता है. चमड़े और हड्डियों की अलग से कीमत मिलती है!
• जो पशु गांव में औसतन 8000-9000/- रुपये में मिल जाते हैं और सूखे वाले प्रदेशो में तो यह 3000/- रुपये में ही मिल जाते हैं। पशु की कीमत 8000/- उसे काटने से मिला मांस 350 किलो
• भारत में उस मांस का दाम 350x120 = 42,000/- रुपये, चमड़े का दाम 1000/-
• विदेशो में निर्यात करने पर यही मांस 3 से 4 गुना दाम में बिकता है और यह निर्भर करता है कि उसे किस देश में भेजा जा रहा है|.
• किसान को मिला सिर्फ 9000/- रुपये और कत्लखाना चलाने वाले को मिले 43000 - 9000 = 34,000/- रुपये।
• भारत में एक-एक कत्लखाने में 10,000 से 15,000 पशु रोज कट रहे हैं यानी औसत 12,000 पशु रोज।
तो- एक कत्लखा मालिक एक दिन में 34000x12000 = 40,80,00,000/- (चालीस करोड़ रुपये) रोज का मुनाफा कमा रहा है।
• यदि साल में 320 दिन यह काम चले तो 40 करोड़ x 320 = 12800 करोड़ रुपये शुद्ध मुनाफा हुआ सालाना तो कत्लखाना चलाने वाला इसे क्यों बंद करेगा! उसको जबरदस्ती बंद करवाना पड़ेगा और वो काम सरकार कर सकती है. इसलिए गौरक्षक सरकार लानी होगी!
• उत्तर प्रदेश मे 8 अत्याधुनिक कत्लखानों के लिए जो टेंडर मंगवाएँ हैं उनमें ऐसी मशीनों का प्रयोग होगा जो 1 दिन में हजारों मवेशियों की 'हत्या' करेगी. एक ऐसी मशीन है जिसमें पशु को एक संकरी गली में घुसेड़ा जाता है और आखिरी सिरे पर एक दर्पण होता है मवेशी उसे छूने के लिए जैसे ही अपना सिर अंदर करता है. मशीन उसकी गर्दन को जकड़ लेती है और तुरंत उसका सिर धड़ से अलग हो जाता है।
• क्या आपको पता है की उत्तर प्रदेश में 15 कत्लखाने खोलने की अनुमति चीफ मिनिस्टर (अखिलेश यादव) ने दी है, जहां एक कत्लखाने में एक दिन में 10,000 (दस हजार) जानवरों को काटा जायेगा तो एक दिन में 15 कत्लखानों में 1,50,000 जीवों की 'हत्या' होगी।
अगर आप जीव प्रेमी हैं, तो इस Message को इतना विस्तार दें कि सभी इसके समर्थन में खड़े हो जाएँ और चीफ मिनिस्टर को अनुमति वापस लेनी पड़े!
गौरक्षा के लिए इतना तो आप कर ही सकते हैं!
लिन्क: https://www.facebook.com/soniyabgaur/posts/649359131788487

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कार्टून

अखबारों में छपें खूब कार्टून
मुद्दे की बात यह है कि हर अखबार-पत्रिका में एकाधिक कार्टून अनिवार्य रूप से छपने चाहिए। इसके लिए एक सजग पाठक और कार्टून प्रेमी होने के नाते के नाते आप जो अखबार लेते हैं उसे नियमित रूप से अलग-अलग कार्टूनिस्टों के बनाए अधिक कार्टून छापने के लिए पत्र लिखें, ई-मेल करें... लिखते रहें, करते रहें।*
आज का अखबार देखा। कई बार सोचा कि विज्ञापन और पठनीय (?) सामग्री का अनुपात देखा जाए। २ रुपये से ४.५० रुपये में बदले हुए दिल्ली के दैनिक हिन्दुस्तान में आज २०+४ (मूवी मैज़िक- कुछ छोटे आकार के पृष्ठ)+१० (सर्च इंजन- वर्गीकृत/डिस्प्ले विज्ञापन)=३४ पृष्ठ हैं। कुल मुद्रित क्षेत्र (प्रिण्ट एरिया) है- लगभग ५६६८९२ वर्ग सेमी.। इसमें विज्ञापन ३३४७७.७ वर्ग सेमी क्षेत्र में छपे हैं, जब कि पठनीय (?) सामग्री २३२११.५ वर्ग सेमी. छपी है। इस तरह अखबार में लगभग ५९.०५ % विज्ञापन हैं और ४०.९५% सामग्री। यह सिर्फ़ एक अखबार के एक संस्करण की तस्वीर है।
पूरे अखबार में सम्पादकीय पृष्ठ पर एक कार्टून है। पहले पन्ने का पॉकेट कार्टून बन्द कर दिया गया है। भीतर एक कार्टून छपता है छपता है जो प्राय: गायब रहता है। फ़िल्म-टीवी और ऐसी ही तमाम सामग्री आवश्यक रूप से मौजूद रहती है- पाठकों की रुचि के नाम पर। रविवारीय अंक का पहले इन्तज़ार रहता थ, उसे प्राय: संजोकर रखा जाता था। और अब, रविवार को मैं सबसे पहले अपने अखबार के परिशिष्ट ‘मूवीमैज़िक’ को अखबार से निकालकर दूर रख देता हूं। एक पाठक के नाते मैं ऐसा कर सकता हूं।
क्या साधन सम्पन्न इस अखबार में देश के कुछ कार्टूनिस्टों के गैर राजनीतिक यानी पारिवारिक सामाजिक कार्टून और कार्टून स्ट्रिप नहीं छापे जा सकते! कमोवेश यही हाल देश के अन्य छोटे-बड़े अखबारों का भी है। सभी ‘पाठकों की पसन्द’ की सामग्री छाप रहे हैं और पता नहीं इन्हें पाठकों की पसन्द पता कैसे चलती है?
मुद्दे की बात यह है कि हर अखबार-पत्रिका में एकाधिक कार्टून अनिवार्य रूप से छपने चाहिए। इसके लिए एक सजग पाठक और कार्टून प्रेमी होने के नाते के नाते आप जो अखबार लेते हैं उसे नियमित रूप से अलग-अलग कार्टूनिस्टों के बनाए अधिक कार्टून छापने के लिए पत्र लिखें, ई-मेल करें...लिखते रहें, करते रहें।
हो सकता है आपको लगे मैं स्वार्थी हूं और मैं अपनी बात थोप रहा हूं। बिल्कुल, मैं स्वार्थी हूं- कार्टून, कार्टून कला और कार्टूनिस्टों के हित में (इनमें मैं भी शामिल हूं) मुझे यह भी स्वीकार है! आप साथ हैं तो आप और हम मिलकर स्थिति बदल सकते हैं।
*(ऊपर दिए आंकड़े कुछ माह पुराने और अनुमानित हैं इन्हें मानक न मानें- बस थोड़ी जानकारी साझा करने के लिए यह सिर खपाई की गयी है।)
• कार्टूनिस्ट चन्दर
शिकायत बोल- http://shikayatbol.blogspot.in/
http://cartoonnewshindi.blogspot.in/
-->

नामकरण

हत्यारे और बलात्कारियों के नाम पर  हैं कई शहरों के नाम
बड़े आकार में देखने हेतु ग्राफ़िक पर क्लिक करें
आज भी कई शहरों के नाम अंग्रेजों के उन क्रूर अधिकारियों के नाम रखे हुए हैं जिन्होंने भारत की अनेक माँ-बहनों के साथ बलात्कार किेए, किसानों को बेघर किया, हमारी संस्कृति को कमजोर किया, हमारी संपदा को लूटा जैसे लेंड्स डाउन (उतराखंड ), मक्लीयोड गंज, डलहोजी (हिमाचाल प्रदेश ), वास्को डी गामा (गोवा ) आदि।
आश्चर्य की बात यह है कि जो पार्टी अपने आप को राष्ट्रवादी पार्टी कहती है उसके शासन ने भी इन राज्यों इन नामों को बदला नहीं हैं।
अब आप ही बताइए हम किसका भरोसा करें। हमारी लड़ाई तो इस देश में कोई नहीं लड़ रहा है। हम तो अकेले पड़ गये हैं। आजकल जो अकेले रह गए हैं वो ही सनातनी कहलाते हैं।
नोट : फोटो में डलहोजी और मेक्लिओद गंज हिमाचल प्रदेश में हैं।
जो राष्ट्र आजादी के बाद अपने अस्तित्व और स्वाभिमान के लड़ाई नहीं लडेगा वो किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता है।
- महामना राजीव दीक्षित
स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ
-->

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

अमूल का धोखा

अमूल की पैकिंग
आज यानी २२/१०/१३ (22/10/13) को जब अमूल गोल्ड यानी शुद्ध फ़ुल क्रीम दूध घर में आया तो ५०० मिली के तीनों पैकिटों पर पैकिंग की तारीख २४/१०/१३ (24/10/13) छपी देखकर आश्चर्य हुआ। सच, यह भारत है यहां सब हो सकता है। कोई देखने वाला नहीं है।
चारों ओर मनमानी है। अमूल का जब मन करता है तब १-२ रुपये प्रति लि. दूध की दर बढ़ा दी जाती है। किसानों से १८-२० रुपये लि. का खरीदा गया दूध हमारे पास आते-आते ४२ रु. लि. हो जाता है- प्रोसेस व पैकिंग के कारण। जैसा कि शुद्ध दूध का दावा किया जाता है, कौन जाने हम क्या पी रहे हैं। कई बार सुनने में आया है कि खरीदे गये दूध से बेचे गये दूध की मात्रा अधिक होती है। वह अतिरिक्त दूध कहां से आया? आयातित पाउडर का बना या....। जिस देश में रोजाना हज़ारों-लाखों पशु कट रहे हों वहां दूध की मात्रा पर आज नहीं तो जल्दी ही सवाल उठेंगे। ये दूध कम्पनियां मुनाफ़े के लिए तमाम अन्य उत्पाद भी बनाती हैं।

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

आधार

आधार में पलीता
ये है नंदन नीलेकनी। ये भारत सरकार में युनिक आईडेण्टिटी (UID) और आधार कार्ड स्कीम के मुखिया है।. ये भारत की दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस के सहसंस्थापक थे और उसके चेयरमैन भी रहे। बाद मे 2009 मे कम्पनी से इस्तीफ़ा देकर भारत सरकार ली इस योजना के मुखिया बने।
नंदन नीलेक आजकल काफी चर्चा में हैं. इसके दो कारण हैं.
1- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधार कार्ड की अनिवार्यता को रद्द किया जाना।
2- 19 सितम्बर को इनके दिये बयान के अनुसार जल्द ही कांग्रेस ज्वाइन करेंगे।
आधार कार्ड योजना शुरुआत से ही शक के दायरे मे रही है। जो सबसे बङा तथ्य हम अपने पेज के माध्यम से रख रहे हैं वो यह है की आधार कार्ड और यूआईडी की सारी जानकारी इकठ्ठा करने की जिम्मेवारी जिस कम्पनी को दी गयी है वह अमेरिकन जासूसी संस्था CIA की सहयोगी है। उसका नाम एल-१ आइडेण्टिटी सॉल्यूशन्स  (L-1 identity solutions) है।
भारत सरकार ने जहां हर नागरिक की इतनी महत्वपपूर्ण जानकारी के इच्छा के नाम पर ह्वुआई और देवास से समझौते रद्द कर दिए वहीं न जाने क्यों इस कम्पनी से समझौता कर लिया।
दुसरी सबसे बङी बात यह हुई की data collection का सारा कार्य तमाम NGOs को सौप दिया गया जिससे भारी मात्रा मे अवैध बंग्लादेशी नागरिकों ने गलत सूचना देकर आधार कार्ड प्राप्त कर लिए, यह गङबङी इतनी ज्यादा हुई कि एक अभियान के दौरान मुम्बई के केवल एक उपनगर में 56 बंग्लादेशी अवैध तरीके से आधार कार्ड बने हुए मिले।
इस भारी भरकम योजना के तहत सरकार ने बेवजह 4500 करोङ रुपये बर्बाद कर दिए, वहीं कई जगह यह भी आरोप लगा कि इस योजना में शामिल NGOs ने भारी वित्तीय अनियमितता की है।
जिन भी अवैध नागरिको ने आधार कार्ड बनवा लिये हैं वो भले ही अवैध क्यों न हों वो सरकारी सब्सिडी पाने के अधिकारी हो गये, सबसे बङा सत्य तो यह है की अवैध नागरिकों ने ही सबसे पहले आधार कार्ड बनवा लिए।
ये तो कुछ बाते थी आधार कार्ड की जिससे राष्ट्र की आर्थिक और खुफ़िया सुरक्षा दांव पर लग गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके जरुरी किए जाने के सरकार के अदूरदर्शी फैसले को रद्द कर दिया है।
नंदन नीलेकङी की यह योजना फ्लाप हो चुकी है। अब वह जल्द ही कांग्रेस मे शामिल होने जा रहें हैं और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस उन्हें सम्भवत: दक्षिण बंगलौर सीट से मैदान मे उतार सकती है।
• स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ
ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक पढें-.
मीडिया रिपोर्ट - 10 अक्टुबर
http://www.indianexpress.com/news/is-he-joining-congress--nilekani-says-possibly/1171037/
http://www.deccanherald.com/content/212980/how-does-govt-justify-aadhaar.html/