शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

अमूल का धोखा

अमूल की पैकिंग
आज यानी २२/१०/१३ (22/10/13) को जब अमूल गोल्ड यानी शुद्ध फ़ुल क्रीम दूध घर में आया तो ५०० मिली के तीनों पैकिटों पर पैकिंग की तारीख २४/१०/१३ (24/10/13) छपी देखकर आश्चर्य हुआ। सच, यह भारत है यहां सब हो सकता है। कोई देखने वाला नहीं है।
चारों ओर मनमानी है। अमूल का जब मन करता है तब १-२ रुपये प्रति लि. दूध की दर बढ़ा दी जाती है। किसानों से १८-२० रुपये लि. का खरीदा गया दूध हमारे पास आते-आते ४२ रु. लि. हो जाता है- प्रोसेस व पैकिंग के कारण। जैसा कि शुद्ध दूध का दावा किया जाता है, कौन जाने हम क्या पी रहे हैं। कई बार सुनने में आया है कि खरीदे गये दूध से बेचे गये दूध की मात्रा अधिक होती है। वह अतिरिक्त दूध कहां से आया? आयातित पाउडर का बना या....। जिस देश में रोजाना हज़ारों-लाखों पशु कट रहे हों वहां दूध की मात्रा पर आज नहीं तो जल्दी ही सवाल उठेंगे। ये दूध कम्पनियां मुनाफ़े के लिए तमाम अन्य उत्पाद भी बनाती हैं।

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

आधार

आधार में पलीता
ये है नंदन नीलेकनी। ये भारत सरकार में युनिक आईडेण्टिटी (UID) और आधार कार्ड स्कीम के मुखिया है।. ये भारत की दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस के सहसंस्थापक थे और उसके चेयरमैन भी रहे। बाद मे 2009 मे कम्पनी से इस्तीफ़ा देकर भारत सरकार ली इस योजना के मुखिया बने।
नंदन नीलेक आजकल काफी चर्चा में हैं. इसके दो कारण हैं.
1- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधार कार्ड की अनिवार्यता को रद्द किया जाना।
2- 19 सितम्बर को इनके दिये बयान के अनुसार जल्द ही कांग्रेस ज्वाइन करेंगे।
आधार कार्ड योजना शुरुआत से ही शक के दायरे मे रही है। जो सबसे बङा तथ्य हम अपने पेज के माध्यम से रख रहे हैं वो यह है की आधार कार्ड और यूआईडी की सारी जानकारी इकठ्ठा करने की जिम्मेवारी जिस कम्पनी को दी गयी है वह अमेरिकन जासूसी संस्था CIA की सहयोगी है। उसका नाम एल-१ आइडेण्टिटी सॉल्यूशन्स  (L-1 identity solutions) है।
भारत सरकार ने जहां हर नागरिक की इतनी महत्वपपूर्ण जानकारी के इच्छा के नाम पर ह्वुआई और देवास से समझौते रद्द कर दिए वहीं न जाने क्यों इस कम्पनी से समझौता कर लिया।
दुसरी सबसे बङी बात यह हुई की data collection का सारा कार्य तमाम NGOs को सौप दिया गया जिससे भारी मात्रा मे अवैध बंग्लादेशी नागरिकों ने गलत सूचना देकर आधार कार्ड प्राप्त कर लिए, यह गङबङी इतनी ज्यादा हुई कि एक अभियान के दौरान मुम्बई के केवल एक उपनगर में 56 बंग्लादेशी अवैध तरीके से आधार कार्ड बने हुए मिले।
इस भारी भरकम योजना के तहत सरकार ने बेवजह 4500 करोङ रुपये बर्बाद कर दिए, वहीं कई जगह यह भी आरोप लगा कि इस योजना में शामिल NGOs ने भारी वित्तीय अनियमितता की है।
जिन भी अवैध नागरिको ने आधार कार्ड बनवा लिये हैं वो भले ही अवैध क्यों न हों वो सरकारी सब्सिडी पाने के अधिकारी हो गये, सबसे बङा सत्य तो यह है की अवैध नागरिकों ने ही सबसे पहले आधार कार्ड बनवा लिए।
ये तो कुछ बाते थी आधार कार्ड की जिससे राष्ट्र की आर्थिक और खुफ़िया सुरक्षा दांव पर लग गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके जरुरी किए जाने के सरकार के अदूरदर्शी फैसले को रद्द कर दिया है।
नंदन नीलेकङी की यह योजना फ्लाप हो चुकी है। अब वह जल्द ही कांग्रेस मे शामिल होने जा रहें हैं और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस उन्हें सम्भवत: दक्षिण बंगलौर सीट से मैदान मे उतार सकती है।
• स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ
ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिंक पढें-.
मीडिया रिपोर्ट - 10 अक्टुबर
http://www.indianexpress.com/news/is-he-joining-congress--nilekani-says-possibly/1171037/
http://www.deccanherald.com/content/212980/how-does-govt-justify-aadhaar.html/

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

सेंधा नमक

स्वास्थ्यप्रद और निरापद है सेंधा नमक 
साधारण या आयोडीन युक्त नमक काफ़ी तेज होता है जिसके सेवन से शरीर में ब्लड प्रेशर, चर्म रोग, फेफड़ा, नेत्र रोग, मोटापा, शरीर में जकड़न सहित बीस घातक बीमारियां होती हैं। पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी भोजन में सेंधे नमक के ही इस्तेमाल की सलाह दी गयी है। भोजन में नमक व मसाले का प्रयोग भारत, नेपाल, चीन, बांगलादेश और पाकिस्तान में अधिक होता है। आजकल बाजार में ज्यादातर समुद्री जल से तैयार नमक ही मिलता है। 
प्रसिद्ध वैज्ञानिक और समाज सेवी राजीव भाई दीक्षित का कहना है की समुद्री नमक तो अपने आप में बहुत खतरनाक है लेकिन उसमे आयोडिन मिलाकर उसे और जहरीला बना दिया जाता है। आयोडिन की शरीर में मे अधिक मात्रा जाने से नपुंसकता जैसा गंभीर रोग हो जाना मामूली बात है। प्राकृतिक नमक हमारे शरीर के लिये बहुत जरूरी है। इसके बावजूद हम सब घटिया किस्म का आयोडिन मिला हुआ समुद्री नमक खाते हैं। यह शायद आश्चर्यजनक लगे, पर यह वास्तविकता है ।नमक विशेषज्ञ एनके भारद्वाज का कहना है कि भारत मे अधिकांश लोग समुद्र से बना नमक खाते हैं जो कि शरीर के लिए हानिकारक और जहर के समान है। सेंधा नमक सर्वोत्तम है, जो पहाड़ी नमक है । अहमदाबाद के प्रख्यात वैद्य मुकेश पानेरी अनुसार आयुर्वेद की बहुत सी दवाइयों मे सेंधा नमक उपयोग होता है। आम तौर से उपयोग मे लाये जाने वाले समुद्री नमक से उच्च रक्तचाप, डाइबिटीज़, लकवा आदि गंभीर बीमारियों का भय रहता है। इसके विपरीत सेंधा नमक उपयोग करने से रक्तचाप पर नियन्त्रण रहता है। इसकी शुद्धता के कारण ही इसका उपयोग व्रत के भोजन मे होता है।
मुग़ल काल में खोदा गया पाकिस्तानी पंजाब में खेवड़ा नमक खान
में यह नमक केपत्थर से घिरा कमरा। (सौजन्य: विकी पीडिया) 
ऐतिहासिक रूप से पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को 'सेंधा नमक' या 'सैन्धव नमक' कहा जाता है जिसका मतलब है 'सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ'। अक्सर यह नमक इसी खान से आया करता था। सेंधे नमक को 'लाहौरी नमक' भी कहा जाता है क्योंकि यह व्यापारिक रूप से अक्सर लाहौर से होते हुए पूरे उत्तर भारत में बेचा जाता था।
भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था। विदेशी कंपनीयां भारत मे नमक के व्यापार मे आज़ादी के पहले से उतरी हुई हैं,उनके कहने पर ही भारत के अँग्रेजी प्रशासन द्वारा भारत की भोली-भली जनता को आयोडिन मिलाकर समुद्री नमक खिलाया जा रहा है। सिर्फ आयोडीन के चक्कर में ज्यादा नमक खाना समझदारी नहीं है, क्योंकि आयोडीन हमें आलू, अरबी के साथ-साथ हरी सब्जियों से भी मिल जाता है।

साधारण या आयोडीन युक्त नमक काफ़ी तेज होता है जिसके सेवन से शरीर में ब्लड प्रेशर, चर्म रोग, फेफड़ा, नेत्र रोग, मोटापा, शरीर में जकड़न सहित बीस घातक बीमारियां होती हैं। पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी भोजन में सेंधे नमक के ही इस्तेमाल की सलाह दी गयी है। भोजन में नमक व मसाले का प्रयोग भारत, नेपाल, चीन, बांगलादेश और पाकिस्तान में अधिक होता है। आजकल बाजार में ज्यादातर समुद्री जल से तैयार नमक ही मिलता है। जबकि 1960 के दशक में देश में लाहौरी नमक खूब मिलता था। यहां तक कि राशन की दुकानों पर भी इसी नमक का वितरण किया जाता था। यह स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है। समुद्री नमक के बजाय सेंधे नमक का प्रयोग होना चाहिए। समुद्री नमक के कारण उच्च रक्तचाप की संभावना बनती है। दिल की बीमारी भी संभव है। हार्टअटैक का खतरा कम करने के लिए चिकित्सक हमेशा भोजन में नमक कम मात्रा में लेने की सलाह देते हैं।
सेंधे नमक का क्रिस्टल (विकी पीडिया) 
यह सफ़ेद और लाल रंग मे पाया जाता है। सफ़ेद रंग वाला नमक उत्तम होता है। यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन में मददगार, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़ते हैं। सबसे बडी समस्या है कि भारत मे सेंधा नमक काफ़ी कम मात्रा में पैदा होता है और वह भी शुद्ध नहीं होता। भारत में खाया जाने वाला ८० प्रतिशत नमक समुद्री नमक है, १५ प्रतिशत जमीनी और केवल पांच प्रतिशत पहाड़ी यानि कि सेंधा नमक। सबसे अधिक सेंधा नमक पाकिस्तान के मुल्तान की पहडि़यों में पाया जाता है।
मौसमी खाँसी के लिए सेंधे नमक की बड़ी सी डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी से आराम मिलता है। नमक की डली को सुखाकर रख लें एक ही डली का बार बार प्रयोग किया जा सकता है। किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श भी ले लें। 
रक्त विकार आदि के रोग जिसमे नमक खाने को मना हो उसमे भी इसका उपयोग किया जा सकता है। यह पित्त नाशक और आंखों के लिये हितकारी है। यह दस्त, कृमिजन्य रोगों और रह्युमेटिज्म मे काफ़ी उपयोगी होता है। सेंधे नमक के विशिष्ठ योग- हिंग्वाष्टक चूर्ण, लवण भास्कर और शंखवटी इसके कुछ विशिष्ठ योग हैं ।

सोमवार, 23 सितंबर 2013

बे-आधार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

जरूरी नहीं है आधार कार्ड बनाना


नई दिल्लीअब हर नागरिक को आधार कार्ड बनवाना अनिवार्य नहीं है। आधार कार्ड बनवाने- न बनवाने का फैसला लोगों की इच्छा पर निर्भर है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक विशेष फैसले में केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि आवश्यक सेवाओं जैसे एलपीजी कनेक्शन, टेलीफोन वगैरह के लिये आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि किसी भी अवैध व्यक्ति का आधार कार्ड न बने। 
एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया। सबसे ज्यादा भ्रम की स्थिति एलपीजी के मसले पर ही थी जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब दूर हो गई है। एलपीजी के लिए आधार कार्ड होना जरूरी नहीं। 
पहले कहा जा रहा था कि रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी आधार कार्ड से जुड़े आपके बैंक एकाउंट में आएगी। जब आपने आधार कार्ड बनवाकर अपने बैंक अकाउंट से उसे लिंक कराया होगा तभी सब्सिडी की राशि तभी एकाउंट में आएगी। यह बात भी कही जा रही रही थी कि आधार कार्ड न होने पर ग्राहक को बाज़ार भाव पर गैस सिलेण्डर खरीदना पड़ेगा। 
इससे पहले केंद्र सरकार ने भी साफ तौर पर कहा था कि सरकारी सब्सिडी का फायदा लेने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला ने राज्यसभा में कहा था कि सब्सिडी वाली किसी भी सरकारी योजना के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। 
लेकिन सरकार अपनी कई योजनाओं को पहले ही आधार कार्ड से जोड़ चुकी है। ऐसे में सरकार का यह कहना कि इसे बनवाना लोगों की इच्छा पर है उस पर कई सवाल उठते हैं। मोबाइल द्वारा गैस बुकिंग के दौरान आधार कार्ड सम्बन्धी सन्देश ने भी लोगों को परेशान कर दिया था।
लिन्क देखें-  बैंक अकाउंट के लिए आधार कार्ड जरूरी नहीं   अब बाघों का भी बनेगा आधार कार्ड • रसोई गैस सब्सिडी के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं

बुधवार, 24 जुलाई 2013

तंदरुस्ती

लाइफ़बॉय है यहां तंदरुस्ती है कहाँ
दोस्तो यह कैसा मूर्खताभरा विज्ञापन प्राय: विदेशी कंपनी द्वारा टीवी पर दिखाया जाता है! लाइफ़बॉय है जहां तंदरुस्ती है वहाँ! इसका मतलब तंदरुस्ती लाइफ़बॉय से आ रही है? तो रोटी -पानी क्यूँ कर रहे हो भाई? खाना क्यूँ खा रहे हो? लाइफ़बॉय ही लगाओ तंदरुस्ती आती रहेगी। आप बताइए, तंदरुस्ती का साबुन लाइफ़बॉय हो सकता है? तंदरुस्ती का आधार दूध हो सकता है, दही हो सकता है, सब्जियाँ हो सकती हैं, चावल हो सकता है, दालें हो सकती हैं, मेवे हो सकते हैं।  यह लाइफ़बॉय कब से हुआ?
अब अकल की बात तो यही हैं न कि साबुन तंदरुस्ती का आधार नहीं होता लेकिन मूर्ख लोग फिर भी इसे खरीदते हैं। शायद आपको मालूम है लाइफ़बॉय दुनिया का सबसे घटिया साबुन है। दुनिया में 3 तरह के साबुन होते हैं। 
१. स्नान का साबुन  bath Soap
२. शौचालय/हाथ धोने का साबुन toilet Soap
३. जानवारो को नहलाने के लिए/कीटाणुनाशक साबुन  carbolic soap
लाइफ़बॉय सर्कावविदित कार्बोलिक साबुन है। कंपनी खुद इस बात को मानती है कि यह कार्बोलिक साबुन है।
यहाँ क्लिक कर जांचें- http://youtu.be/AOU3ZIrUiVM
यूरोप के देशों में लोग लाइफ़बॉय से कुते, बिल्लियां, गधों आदि जानवरों को नहलाते हैं। लेकिन भारत में ७ करोड़ लोग रोज़ लाइफ़बॉय  से नहाते है।
विदेशी कंपनिया देश में जो भी जहर बेचें लेकिन देश की भ्रष्ट सरकार और बिका हुआ मीडिया अपने मुँह में फ़ैवीकोल डाल कर बैठे हैं। इनको सिर्फ़ दूध,घी,मावा आदि में ही जहर नजर आता हैं। वो भी दिवाली या त्यौहारों के दिनों में तकि विदेशी कंपनियों के द्वारा बनायी चॉकलेट या अन्य विज्ञापित उत्पाद बिकें। इन कम्पनियों के उत्पादों के घटिया होने का प्रमाण देखना हो तो आप लाइफ़बॉय से नहाइए।  
नहाने के बाद अपनी बाजू पर नाखून से जरा सा रगड़ें। आप देखेंगे कि सफ़ेद रंग की एक लाइन खिंच गयी है।
ऐसा इसलिए हुआ इस लाइफ़बॉय के कैमिकल कचरे ने आपकी त्वचा की प्राकृतिक चिकनाहट (natural oil) को नष्ट कर दिया जिससे आपकी त्वचा रूखी और बेजान हो गई। और इस तरह अपनी रूखी और बेजान त्वचा पर अगर आप बार-बार साबुन रगड़ते जाएंगे तो एक न एक दिन आपको दाद, छाजन, खुजली (eczema) आदि चर्म रोग हो सकते हैं। यह विदेशी कंपनी का जहर लाइफ़बॉय  हैं। 
पढ़े लिखे मूर्खों को कुछ नहीं पता, बस टीवी पर विज्ञापन देखा और उत्पाद को सूंघा और घर ले आए। उसके भीतर क्या है, जानने की कोशिश प्राय: ज्यादातर लोग नहीं करते। इस मामले में बच्चों और पत्नी की पसन्द और ज़िद भी खूब चलती है। और एक बात पर ध्यान दें- विज्ञापन मे बोलते है लाइफ़बॉय मैल मे छिपे कीटाणुओं को धो डालता है। यानी लाइफ़बॉय मैल को नहीं धोता, वह मैल मे छिपे कीटाणुओ को ही धो डालता है। मारता नहीं है सिर्फ़ धोता है इसका मतलब धो -पोंछ के उनको और तंदरुस्त बना देता है। 
कृपया जरूर इस लिंक पर क्लिक कर देखे और दिखाएं- https://www.youtube.com/watch?v=AOU3ZIrUiVM 
कुम्भ मेले में ’लाफ़बॉय’ का कमाल (फ़ोटो साभार)

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

हिन्दी

कहां गयी हिन्दी! 
आम आदमी के लिए उपलब्ध कराये गये बाबा रामदेव के ‘पतंजलि’ के उत्पाद हनी/शहद के दोनों ओर के लेबलों पर मात्र एक जगह हिन्दी का प्रयोग हुआ है, वह भी केवल पतंजलि के लोगो के रूप में।
मातृ भाषा की जय...वन्दे मातरम्!

सोमवार, 1 जुलाई 2013

कब्ज़ा

बाप का फ़ुटपाथ

बुधवार, 1 मई 2013

ग्राहक

जागो ग्राहक जागो 
कैसे बचे असंगठित अपभोक्ता 
कोई भी वस्तु अगर आप बारह या पंद्रह रुपये की खरीदें तो दुकानदार कहता है कि पूरे 20 रुपये की कर दें? केवल रेहड़ी वाले ही नहीं बल्कि अच्छी-भली व बड़ी दुकानों वाले भी आजकल पांच-सात, दो-चार यहां तक कि दस रुपये बकाया होने पर ग्राहक को पैसे लौटाने के बजाए उन्हें टाफ़ी,गोली या माचिस आदि थमाकर चलता कर देते हैं।
निर्मल रानी
मिठाई के साथ मिठाई के डिब्बों का वज़न न किए जाने के प्राय: सरकार द्वारा निर्देश जारी किए जाते हैं.परंतु आज शायद ही कोई ऐसा मिठाई विक्रेता हो जो डिब्बों का वज़न मिठाई के साथ न करता हो। यही नहीं बल्कि गत्ते के डिब्बे के दोनों भाग एक साथ जोडक़र उसमें मिठाई रखी जाती है। यानी एक ओर तो मिठाई की कीमतें आसमान छू रही हैं दूसरी ओर आपको मिठाई के रेट में ही गत्ते के डिब्बे को भी खरीदना पड़ रहा है। यह बात यहीं ख्त्म नहीं होती.बल्कि अब तो मिठाई के डिब्बों का वज़न बढ़ाने के लिए डिब्बों के भीतर भी तरह-तरह की कलाकारियां की जा रही हैं।
डिब्बों में बाकायदा अलग-अलग भाग बनाए जाते है तथा उनमें अलग-अलग तरह की मिठाई प्रत्येक भाग में रखी जाती है। इसके लिए अतिरिक्त गत्ते के डिब्बे में रखा जाता है। कई बार ऐसा भी हुआ कि मिठाई के डिब्बे के निचले हिस्से में काफी मोटे गत्ते का बड़ा टुकड़ा बेवजह रखा पाया गया। सवाल यह है कि प्रशासन की नाक तले पूरे देश में हर वक्त चलने वाले इस लूट के धंधे से क्या प्रशासन बेखबर है? आखिर सरकार व प्रशासन की अनदेखी का ही परिणाम है कि आज असंगठित उपभोक्ता कभी मिलावटी, नक़ली व ज़हरीली मिठाई खरीदने को मजबूर रहता है तो कभी उसे उसकी अदा की हुई क़ीमत के बराबर के वज़न की मिठाई भी मयस्सर नहीं हो पाती।
इसी प्रकार तमाम फल व सब्ज़ी वालों ने आजकल ग्राहकों को लूटने का एक नया तरीका निकाल रखा ह। उदाहरण के तौर पर पचास रुपये किलो बिकने वाला आम यदि दुकानदार एक किलो का मूल्य पचास रुपये मांगता है तो वह उसी आम को दो किलो लेने पर ग्राहक को 90 रुपये देने की बात करता है। परंतु यदि ग्राहक दुकानदार से पैंतालिस रुपये का एक किलो आम देने को कहता है तो वह दुकानदार मना कर देता है।
६ माह में ४ बार बदली गयी सीएफ़एल
अन्त में परेशान दुकानदार ने हाथ जोड़ दिए।
कम्पनी ने शिकायत का कोई जवाब नहीं दिया।
अब पांच रुपये बचाने की लालच में आकर ग्राहक दुकानदार से दो किलो आम मांग बैठता है। उधर दुकानदार जानबूझ कर ऐसे आकार के आम तराज़ू पर रखता है जिनका वज़न दो किलो से भी थोड़ा सा ऊपर हो जाए। अब यदि सौ या डेढ़ सौ ग्राम आम दो किलो से ज़्यादा हुआ तो दुकानदार पूरे सौ रुपये ग्राहक से मांग लेता है और वह असंगठित उपभोक्ता जोकि 40-45 या पचास रुपये तक का अधिकतम बजट बनाकर आम खरीदने आया था वह पचास रुपये किलो के बजाए 45 रुपये किलो की दर से आम खरीदने के चक्कर में अपने सौ रुपये खर्च कर आता है।
यही हाल ज़्यादातर सब्ज़ी व फल बेचने वालों की दुकानों पर देखा जा सकता है.कोई भी वस्तु अगर आप बारह या पंद्रह रुपये की खरीदें तो दुकानदार कहता है कि पूरे 20 रुपये की कर दें? केवल रेहड़ी वाले ही नहीं बल्कि अच्छी-भली व बड़ी दुकानों वाले भी आजकल पांच-सात, दो-चार यहां तक कि दस रुपये बकाया होने पर ग्राहक को पैसे लौटाने के बजाए उन्हें टाफ़ी, गोली या माचिस आदि थमाकर चलता कर देते हैं.यह उपभोक्ताओं के साथ होने वाली खुली लूट नहीं तो और क्या है?
अंसगठित उपभोक्ता को लूटने में केवल मिठाईयों वाले या रेहड़ी वाले ही सक्रिय नहीं हैं बल्कि जानी-मानी बड़ी से बड़ी राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर स्थानीय उत्पादक तक मंहगाई की आड़ में उपभोक्ताओं को दोनों हाथों से लूटने का ज़बरदस्त हथकंडा अपनाए हुए हैं। उदाहरण के तौर पर यदि साबुन या डिटर्जेंट या इस प्रकार की और तमाम वस्तुओं को लिया जाए तो हम यह देखेंगे कि कंपनियों ने मंहगाई के नाम पर ऐसी वस्तुओं की कीमतें तो बढ़ाई ही हैं साथ-साथ उन्होंने अपने इन उत्पादों की पैकिंग का वज़न भी कम कर दिया है। यानी उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ रही है.गोया वह किसी एक वस्तु की कीमत इसलिए ज़्यादा दे रहा है क्योंकि बाज़ार में चीज़ें मंहगी होती जा रही हैं।
आखिर ऐसा क्यों? क्या इन कंपनियों को मात्र मूल्य बढ़ाने भर से संतुष्टि नहीं होती जोकि यह देश के असंगठित उपभोक्ताओं को वस्तु का वज़न भी कम देते हैं? साबुन, पेस्ट, शैंपू, डिटर्जेंट, वाशिंग पाऊडर, रूह अफ़ज़ा जैसे और भी कई उत्पाद इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं जिनके मूल्य भी बढ़ रहे हैं और वज़न भी कम होता जा रहा है।
जबसे मंहगाई बढऩे का सिलसिला शुरु हुआ है तबसे टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाली खबरों पर आम दुकानदार भी खासतौर पर नज़रें रखने लगा है। टीवी चैनल्स के मध्य चल रही प्रतिस्पर्धा के वर्तमान दौर में टी वी पत्रकार भी जनता में सनसनी फैलाने के लिए कोई न कोई निराली व ध्यान आकर्षित करने वाली खबरें ढंढते रहते हैं और इसी कड़ी में यदि किसी टीवी चैनल पर मान लीजिए यह ख़बर प्रसारित हो गई कि लखनऊ में टमाटर 60 रुपये किलो की दर से बिक रहा है तो लखनऊ से सात-आठ सौ किलोमीटर दूर हरियाणा व पंजाब का सब्ज़ी विक्रेता भी लखनऊ की इस ख़बर से प्रभावित होकर अपने 20-30 रुपये प्रतिकिलो बिकने वाले टमाटर का मूल्य भी 50-60 रुपये प्रतिकिलो कर देता है।
यदि असंगठित उपभोक्ता उससे यह पूछे कि सुबह तो यही टमाटर तीस रुपये प्रतिकिलो था और अब शाम होते-होते यह पचास व साठ रुपये किलो कैसे हो गया तो इसके जवाब में सब्ज़ी बेचने वाला लखनऊ की मंडी का टमाटर का भाव व उसके टीवी पर प्रसारित होने का हवाला दे बैठता है.गोया अब मंहगाई बढऩे का आधार ख़रीद के लिए दिया जाने वाला अधिक मूल्य नहीं बल्कि सुनी-सुनाई बातें, अफवाहें तथा रेडियो व टीवी के समाचार आदि हो कर रह गए हैं।
अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए दुकानदार ग्राहाकों के साथ एक और अन्याय यह कर रहे हैं कि वे सस्ती, घटिया व अधिक मुनाफ़ा देने वाली तमाम वस्तुओं को ग्राहकों के हाथों बेचकर ख़ुश नज़र आते हैं। जबकि टिकाऊ, अच्छी, ब्रांडेड वस्तुएं ऐसे दुकानदार बेचना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि इनमें मुनाफ़ा कम मिलता ह। मिसाल के तौर पर एक माचिस की डब्बी को ही ले लीजिए.इस समय देश में सबसे प्रतिष्ठित माचिस निर्माता कंपनी विम्को ही मानी जाती है।
उत्तर भारत में इसके दो ब्रांड होमलाईट व शिप अत्यधिक लोकप्रिय हैं। परंतु अधिकांश दुकानदार माचिस मांगने पर ग्राहक को इस ब्रांड की माचिस देने के बजाए दूसरे घटिया ब्रांड की माचिस थमा देते हैं। हालांकि उनकी कीमत भी दुकानदार वही वसूलते हैं जो शिप या होमलाईट माचिस की होती है। परंतु चूंकि विम्को जैसी कंपनियां दुकानदार को कमीशन कम देती हैं और ग्राहक की सुविधा व ज़रूरत के अनुसार अपना अच्छा उत्पाद तैयार करती हैं इसलिए दुकानदार इन्हें कम बेचता है व घटिया उत्पाद अधिक।इसका नतीजा यह होता है कि दूसरी माचिस जल्दी खत्म हो जाती है। कभी-कभी एक तीली इस्तेमाल करने की जगह चार-पांच तीलियां इस्तेमाल करनी पड़ती हैं तो कभी घटिया माचिस को इस्तेमाल करते समय इसकी चिंगारी छिटककर माचिस जलाने वाले व्यक्ति पर या उसके पास बैठे किसी अन्य व्यक्ति के कपड़ों पर जा गिरती है। इस तरह सस्ती माचिस प्रयोग करने के ‘इनाम स्वरूप’ उपभोक्ता के कीमती कपड़े तक जल जाते हैं।
मगर ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की चाहत रखने वाले दुकानदारों का इन बातों से क्या वास्ता? उन्हें तो महज़ अपनी ज़्यादा कमाई से ही मतलब होता है न कि भगवान का रूप समझे जाने वाले ग्राहकों की सुविधा या उसकी संतुष्टि से.इसी प्रकार और भी तमाम हथकंडे ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर दुकानदारों द्वारा असंगठित उपभोक्ताओ को लूटने का खुला प्रयास किया जा रहा है। इनमें कम तौलना,मिलावटी सामान बेचना, सड़ी-गली व बासी चीज़ें ग्राहकों के हाथों बेच देना, ज़रूरत से अधिक कीमत वसूलना, मांगी गई वस्तु से अधिक वस्तु ग्राहक को ज़बरदस्ती लेने के लिए मजबूर कर देना जैसी तमाम बातें शामिल हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मंहगाई के वर्तमान दौर में असंगठित उपभोक्ता दोनों हाथों से लूटा जा रहा है और सरकार,शासन व प्रशासन मूक दर्शक बना सबकुछ देख रहा है.

निर्मल रानी उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं|
साभार: जनज्वार