शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
फ़ेसबुक पर

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

प्राणवायु

प्रकृति से प्रेम 
एक आदमी एक दिन में इतना ऑक्सीजन लेता है जितने में 3 ऑक्सीजन के सिलेंडर भरे जा सकते हैं| एक ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत होती है 700 रुपये। इस तरह हम देखते हैं कि एक आदमी एक दिन में 2100 रुपये (700X3) की ऑक्सीजन लेता है और 1 साल में 766500 की रुपये और अपने पूरे जीवन (अगर आदमी कि उम्र 65 साल हो) में लगभग 5 करोड़ रुपये की ऑक्सीजन लेता है जो कि पेड़-पौधों द्वारा हमे मुफ़्त में मिलती है और हम उन्ही पेड़ पौधों को समाप्त कर रहे हैं!
आइए, हम पेड़-पौधों की रक्षा करने की शपथ लें, अपने आसपास हरियाली बढ़ाएं। घर में गमलों में ही सही, कुछ पौधे अवश्य लगाएं। जमीन है तो उसमें पेड़-पौधे लगाएं। बहु उपयोगी और वायु शुद्ध करने वाली तुलसी तो हमारे घर में होनी ही चाहिए।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

नाइंसाफ़ी


कानून से ऊपर बाबा राम रहीम! दिल्ली ट्रैफ़िक पुलिस की नाक के नीचे राम रहीम की ६ महंगी गाड़ियों पर एक ही रजिस्ट्रेशन नम्बर DL5CB 3672 (सौजन्य: न्यूज़ २४)


गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

बिजली गॉन, मीटर ऑन

बीएसईएस की कारगुजारी 
बिजली का कनेक्शन काटते समय मीटर की रीडिंग ४४७ यूनिट थी। २ दिन बाद अचानक सूबे सिंह की नज़र मीटर पर पड़ी तो उनके होश उड़ गये। बिना बिजली कनेक्शन के मीटर दौड़ रहा था और उसमें रीडिंग १२५७ थी। उन्होंने अपने इष्ट-मित्र-पड़ोसियों को बुलाकर यह करामात दिखाई। सभी यह देख आश्चर्यचकित और आक्रोषित थे। 
निजी बिजली कम्पनी बीएसईएस (मालिक अम्बानी) के ऊपर दिल्ली की मुख्य मन्त्री श्रीमती शीला दीक्षित की असीम कृपा है। खुलेआम इस कम्पनी का वे पक्ष लेती हैं। तेज दौड़ते बिजली के मीटरों से लोग लम्बे समय से परेशान हैं। मनमाने बिलों से परेशान हैं। पर राहत की बजाय लोगों के हाथ सिर्फ़ परेशानियां ही आती हैं।





पिछले दिनों बिजली का बिल समय पर जमा न कर पाने के कारण दिल्ली के नजफ़गढ़ क्षेत्र के गांव खड़खड़ी रोंद निवासी सूबे सिंह के घर का कनेक्शन काट दिया गया। बिजली का कनेक्शन काटते समय मीटर की रीडिंग ४४७ यूनिट थी। २ दिन बाद अचानक सूबे सिंह की नज़र मीटर पर पड़ी तो उनके होश उड़ गये। बिना बिजली कनेक्शन के मीटर दौड़ रहा था और उसमें रीडिंग १२५७ थी। उन्होंने अपने इष्ट-मित्र-पड़ोसियों को बुलाकर यह करामात दिखाई। सभी यह देख आश्चर्यचकित और आक्रोषित थे।
वे तत्काल इस मामले की शिकायत करने ३ बार उजवा और नजफ़गढ़ दफ़्तर गये। किसी बिजली अधिकारी ने उनकी बात नहीं सुनी। मीटर की जांच के लिए पहले ५० रुपये शुल्क जमा कराकर शिकायत करने को  को कहा गया। सूबे सिंह ने अनेक परेशानियां झेलते हुए बिजली दफ़्तर के अधिकारियों के निर्देशों का पालन किया। फ़िर उन्हें बिजली के बिल की बकाया राशि २३०० रुपये भी जमा कराने को कहा गया। वह भी उन्होंने जमा करा दी। इसके बाद बिजली अधिकारी उनके घर गये और दिया गया विवरण सही पाकर तत्काल मीटर बदलने का पर्चा काट दिया। सूबे सिंह के घर का दो दिन जमकर चला बिजली का फ़िलहाल बन्द है। पर बिजली का दोषयुक्त यह मीटर ये पंक्तियां लिखे जाने तक यानी आज २० अक्टूबर २०११ तक भी नहीं बदला गया है।
यही है जनसेवा करने वाली सरकार के तमाम कामों का एक नमूना।
• सुरेश त्रेहान
नाहरगढ़ साप्ताहिक, नयी दिल्ली



मंगलवार, 16 अगस्त 2011

गुरुवार, 30 जून 2011

तेल भारत

तेल पर सरकार का जनता को मूर्ख बनाने का असली खेल
भारत में जो सरकारी तेल कम्पनिया हैं उनमें बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है। भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम तथा ओएनजीसी में पूरे विश्व में प्रति लीटर मार्जिन, प्रति कर्मचारी खर्च (सेलेरी) का अनुपात बहुत जयादा है। हर तेल कंपनी का 58 % केवल कर्मचारियों पर ही खर्च होता है।
ओएनजीसी के पास 8 जेट जहाज तथा 26 हेलिकॉप्टर है जिनका उपयोग मंत्री और नेता ही करते है। एक आर टी आई से पता चला की जब आर. पी. एन. सिंह पेट्रोलियम राज्य मंत्री थे तो उन्होंने सिर्फ 1 साल में ही 37 बार ओएनजीसी के प्लेन से दिल्ली से अपने क्षेत्र पडरौना की यात्रा की थी।
हर बहस में कांग्रेस के नेता तेल की कीमतों में बढ़ौतरी को जायज ठहराते हैं और सरकार को हो रहे नुकसान का रोना रोते हैं। सरकार और कांग्रेस कब तक जनता को मूर्ख समझती रहेंगी? आज कच्चे तेल की कीमत है 90 डॉलर प्रति बैरेल यानि 25.50 रुपये प्रति लीटर। एक लीटर कच्चे तेल को रिफाइन करने का खर्च है 20 पैसे। यानी सरकार को एक लीटर पेट्रोल की लागत आयी रुपये- 25.70। अब असली खेल यहाँ से शुरू होता है।
केंद्र सरकार
• 13 % उत्पाद कर (एक्साइज)- 30.06 + 13% = 34, पोर्ट टैक्स (तेल के टेंकर से वसूला जाता है)
• 1500 डॉलर छोटे टेंकर से और 25000 डॉलर बड़े टेंकर से एक लीटर पर करीब 3% होगा- 34+3% = 35.02
• 8 % रिफाइनरी मार्जिन टैक्स- 35.02 +8% = 37.82
राज्य सरकार
• 8% से 12.5 % तक वैट- 37.82+ 12.5% = 42.54
रुपये
• 4 % से 8 % तक एजूकेशनल सेस- 42.54+8% = 46
यानी सरकार एक लीटर पेट्रोल से 20 रुपये 25 पैसे पहले ही कमा लेती है। आज पेट्रोल लगभग 68 रुपये तक में बिक रहा है। असल में भारत में जो सरकारी तेल कम्पनिया हैं उनमे बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है। भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल , हिंदुस्तान पेट्रोलियम तथा ओएनजीसी में पूरे विश्व में प्रति लीटर मार्जिन, प्रति कर्मचारी खर्च (सेलेरी) का अनुपात बहुत जयादा है। हर तेल कंपनी का 58 % केवल कर्मचारियों पर ही खर्च होता है।
ओएनजीसी के पास 8 जेट जहाज तथा 26 हेलिकॉप्टर है जिनका उपयोग मंत्री और नेता ही करते है। एक आर टी आई से पता चला की जब आर. पी. एन. सिंह पेट्रोलियम राज्य मंत्री थे तो उन्होंने सिर्फ 1 साल में ही 37 बार ओएनजीसी के प्लेन से दिल्ली से अपने क्षेत्र पडरौना की यात्रा की थी।
आखिर कांग्रेस तेल के पीछे का असली खेल जनता को क्यों नहीं बताती। तेल की कीमतों पर कांग्रेस और सरकार कब तक जनता को मूर्ख बनाते रहेंगे?
• अनिल गुप्ता

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सेवा-मेवा

चोर की दाढ़ी
अल्पसंख्यक और सेवा के बैनर तले यदि सब ठीक-ठाक चल रहा है तो फ़िर घबराना कैसा? डर तो चोर या अपराधी को होता है। इनके गलत क्रियाकलापों के विरुद्ध जो बोले वह ‘साम्प्रदायिक’ कहलाता है और आंख मूंदकर समर्थन करने वाला या इनके सुर में सुर मिलाने वाला या मूक रहने वाला सेकुलर। भारत में दशकों से तरह-तरह से अनवरत चल रहे विभिन्न घातक खेलों में लगे लोगों की जानकारी सरकार को होनी ही चाहिए। सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, धर्मान्तरण आदि के बाद दिखने वाले परिणामों की अनदेखी न करते हुए सख्ती बरतने की ज़रूरत है। बहुत हो गया अब तो ‘बस’ होनी चाहिए।
मध्य प्रदेश सरकार को सही काम करने से रोकता कौन है? राज्य और केन्द्र सरकार को यह पता होना चाहिए कि प्रदेश और देश में विभिन्न संगठन कर क्या रहे हैं, उनके धन के स्रोत क्या हैं, प्राप्त धन का उपयोग किस तरह किया जा रहा है वगैरह। जब ईसाई संगठनों पर जरा भी आंच आती है तो चारों ओर बिलबिलाहट शुरू हो जाती है। साम्प्रदायिक सद्भाव वाले भारत और कुछ लोगों के इण्डिया में बीते तमाम वर्षों में धर्मांतरण जारी रहने से छोटे-बड़े गांवों, शहर-कस्बों, नगर-महानगरो और विशेष  रूप से पिछड़े व सुदूर क्षेत्रों में ईसाइयों और चर्चों की लगातार बढ़ती संख्या खुद अपनी कहानी बयान कर कर रही है। 
सभी धर्म-सम्प्रदायों के संगठन-संस्थाओं की भलीभांति जांच की जानी चाहिए। यदि जरा भी गैर कानूनी कार्य पाया जाए तो उसे रोका जाना चाहिए और उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था-संगठन पर प्रतिबन्ध लगाकर सम्बन्धित लोगों को सजा दी जानी चाहिए। आवश्यक हो तो इसके लिए नये कानून भी बनाए जाएं। पर करेगा कौन?  
• मंगो
समाचार प्रतिलिपि: सचिन खरे 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

सावधान

प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश लेने से पहले रहें सावधान

पत्रकारिता, प्रबन्धन, अभिनय, फोटोग्राफी, मल्टीमीडिया व एनीमेशन, फैशन डिजाइनिंग, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर व नेटवर्किंग, मोबाइल मरम्मत, कॉल सेन्टर ट्रेनिंग आदि विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के अनेक प्रशिक्षण केन्द्र या इंस्टीट्यूट आजकल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। ये इंस्टीट्यूट नगर-महानगरों के युवाओं की योग्यता, क्षमता, उत्साह, आकांक्षा आदि का मजाक उड़ाते लगते हैं। यहां छात्रों के भविष्य और कीमती समय की चिन्ता करने की बजाय इंस्टीट्यूटों के मालिक केवल अधिकतम धन लूटने में लगे रहते हैं। नये पाठ्यक्रम, इंटर्नशिप, ट्रेनिंग, शिविर, रोजगार दिलाने, शैक्षिक यात्रा आदि विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यकता से अधिक धन वसूलना आम है।
राजधानी में अखबारों में कम शुल्क में कम्प्यूटर शिक्षा का धुंआधार विज्ञापन करने वाले एक उद्योगपति होटल मालिक के इंस्टीट्यूट के अच्छी शिक्षा के दावों में कितनी दम है यह बात भुक्तभोगी छात्र अपने कीमती ८-१० महीने और ‘कम फ़ीस’ बरबाद करने के बाद ही जान पाते हैं। यहां अंग्रेजी बोलचाल भी सिखाई जाती है। हां, फ़ीस के बदले कुछ खास नहीं सिखाया जाता, बस २-३ मोटी किताबें जरूर दे दी जाती हैं। आजकल छात्रों को फ़्री लैपटॉप देने की बात भी कही जा रही है। अक्सर इस संस्थान के ‘गुरुओं’ की आवश्यकता के विज्ञापन आते हैं जिनमें मासिक वेतन मात्र १०००० रुपये बताया जाता है। इसी तरह अनेक दुकानें चल रही हैं जिनसे सावधान रहने की ज़रूरत है।
बड़े शहरों में विशेष रूप से ऐसे धंधेबाज इंस्टीट्यूटों की बाढ़ आयी हुई है। यह भी देखने में आया है कि अनेक पाठ्यक्रमों में पूरे साल पढ़ने-पढ़ाने के बाद परीक्षा निकट आते ही बिना कारण बताये छात्रों का प्रवेश पत्र रोक लिया जाता है। कारण, वही मनमानी वसूली। धन मिलने पर ही प्रवेश पत्र दिया जाता है। इस प्रकार की ब्लैक मेलिंग तमाम इंस्टीट्यूटों में चलती है। अच्छीखासी धनराशि वसूलने के बाद ही छात्र को परीक्षा में बैठने दिया जाता है। ऐसे मामलों को लेकर छात्र और अभिभावक काफी परेशान होते हैं। आमतौर पर प्रवेश पत्र रोके जाने का कारण कक्षा में कम उपस्थिति बताने जैसा घिसापिटा बहाना ही बताया जाता है। भारीभररकम जुर्माना देने के बाद सब ठीक हो जाता है।
सम्पन्न अभिभावकों को इसप्रकार जुर्माना चुका पाने में दिक्कत नहीं होती। दिक्कत उन्हें होती है जो मध्य वर्गीय या गरीब होते हैं। जैसे-तैसे वे अपने बच्चों का भविष्य संवारने के सपने को साकार करने को साधन जुटाते हैं। एक मामले में इंजीनियरिंग का छात्र निराश होकर आत्महत्या के लिए भी विवश हो गया। उसने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। सौभाग्य से उसकी बात सुनी गयी और उसे प्रशासन के हस्तक्षेप से प्रवेश पत्र मिल गया। पर सभी के साथ ऐसा नहीं हो पाता।
ऐसे छात्रों की संख्या कम नहीं है जो धंधेबाज इन्स्टीट्यूट संचालकों की मीठी बातों और झूठे वायदों-दावों में फंसकर मोटी राशि चुका देते हैं। ऐसे तमाम इन्स्टीट्यूट हैं जिनके पास न उपयुक्त भवन हैं न सही उपकरण या अन्य सुविधाएं। असलियत का पता प्रायः बाद में ही चलता है। इसी तरह लम्बी अवधि के पाठ्यक्रम के साथ-साथ क्रश कोर्स का दावा भी कई बार खोखला साबित होता है। इसके अलावा अवधि पूरी होने पर परीक्षा के बाद प्रमाण पत्र देने के नाम पर भी धन की मांग की जा सकती है। ऐसी ही तमाम समस्याओं से जूझते अनगिनत युवा अपना कैरियर बिगड़ने के डर से चुप रहते हैं और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।
शिक्षा और प्रशिक्षण की ऐसी दुकानों से सावधान रहना जरूरी हे। शतप्रतिशत रोजगार दिलाने का दम भरने वाले कितने इन्स्टीट्यूट अपना वायदा पूरा करते हैं, ईश्वर ही जाने। अच्छा यही है कि सम्बन्धित इन्स्टीट्यूट में प्रशिक्षण प्राप्त कर रह कुछ छात्रों से बातचीत करने के बाद ही यदि उचित लगे तो वहां प्रवेश लेना चाहिए। इन्स्टीट्यूट संचालक यह भलीभांति जानते हैं कि आज रोजगारपरक शिक्षा या प्रशिक्षण का जमाना है सो वे अपनी शैतानी बुद्धि का उपयोग छात्रों को ठगकर धन ऐंठने में करते हैं। पत्रकारिता और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निरन्तर बढ़ते आकर्षण के चलते तमाम धंधेबाज इन्स्टीट्यूटनुमा दुकानें खोलकर बैठ गये हैं। इनके पास प्रशिक्षण के लिए न उपयुक्त शिक्षक-प्रशिक्षक होते हैं और न ही सही साधन। अनेक टीवी चैनलों ने भी अपनी दुकानें खोल ली हैं।
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को लेकर तमाम मामले प्रकाश में आते हैं और अनेक लोग अदालतों की शरण में भी जाते हैं। यदि छात्र पाठ्यक्रमों से जुड़े सभी कागजात, लिखित अनुबन्ध, नियम, शर्तें, अन्य विवरण आदि प्रस्तुत करते हैं तभी उनका पक्ष मजबूत होता है। धंधेबाज और धोखेबाज इन्स्टीट्यूटों के बारे में शिकायत अवश्य करनी चाहिए। छात्रों को चाहिए कि वे प्रवेश लेने से पहले विश्वविद्यालय या अन्य सम्बन्धित विभाग आदि से मान्यता और सत्यता की जांच कर लेनी चाहिए। इसके अलावा पाठ्यक्रम सम्बन्धी विवरण लिखित में या छपा हुआ लें। मौखिक बातों पर भरोसा कभी न करें। इण्टरनेट की सुविधा के चलते भी धन्धेबाज लोग खूब लाभ उठा रहे हैं। अतः हर वेबसाइट में कही गयी बातों पर बिना सोचे-समझे-परखे आंख मूंदकर विश्वास करना नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। यदि कोई धन्धेबाजों की धोखेबाजी का शिकार बन जाए तो उसे चुप बैठने की बजाय और लोगों को बताने के साथ-साथ उपभोक्ता फोरम में पूरे विवरण के साथ अपना पक्ष अवश्य रखना चाहिए।