शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
फ़ेसबुक पर

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सेवा-मेवा

चोर की दाढ़ी
अल्पसंख्यक और सेवा के बैनर तले यदि सब ठीक-ठाक चल रहा है तो फ़िर घबराना कैसा? डर तो चोर या अपराधी को होता है। इनके गलत क्रियाकलापों के विरुद्ध जो बोले वह ‘साम्प्रदायिक’ कहलाता है और आंख मूंदकर समर्थन करने वाला या इनके सुर में सुर मिलाने वाला या मूक रहने वाला सेकुलर। भारत में दशकों से तरह-तरह से अनवरत चल रहे विभिन्न घातक खेलों में लगे लोगों की जानकारी सरकार को होनी ही चाहिए। सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, धर्मान्तरण आदि के बाद दिखने वाले परिणामों की अनदेखी न करते हुए सख्ती बरतने की ज़रूरत है। बहुत हो गया अब तो ‘बस’ होनी चाहिए।
मध्य प्रदेश सरकार को सही काम करने से रोकता कौन है? राज्य और केन्द्र सरकार को यह पता होना चाहिए कि प्रदेश और देश में विभिन्न संगठन कर क्या रहे हैं, उनके धन के स्रोत क्या हैं, प्राप्त धन का उपयोग किस तरह किया जा रहा है वगैरह। जब ईसाई संगठनों पर जरा भी आंच आती है तो चारों ओर बिलबिलाहट शुरू हो जाती है। साम्प्रदायिक सद्भाव वाले भारत और कुछ लोगों के इण्डिया में बीते तमाम वर्षों में धर्मांतरण जारी रहने से छोटे-बड़े गांवों, शहर-कस्बों, नगर-महानगरो और विशेष  रूप से पिछड़े व सुदूर क्षेत्रों में ईसाइयों और चर्चों की लगातार बढ़ती संख्या खुद अपनी कहानी बयान कर कर रही है। 
सभी धर्म-सम्प्रदायों के संगठन-संस्थाओं की भलीभांति जांच की जानी चाहिए। यदि जरा भी गैर कानूनी कार्य पाया जाए तो उसे रोका जाना चाहिए और उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था-संगठन पर प्रतिबन्ध लगाकर सम्बन्धित लोगों को सजा दी जानी चाहिए। आवश्यक हो तो इसके लिए नये कानून भी बनाए जाएं। पर करेगा कौन?  
• मंगो
समाचार प्रतिलिपि: सचिन खरे 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

सावधान

प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश लेने से पहले रहें सावधान

पत्रकारिता, प्रबन्धन, अभिनय, फोटोग्राफी, मल्टीमीडिया व एनीमेशन, फैशन डिजाइनिंग, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर व नेटवर्किंग, मोबाइल मरम्मत, कॉल सेन्टर ट्रेनिंग आदि विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के अनेक प्रशिक्षण केन्द्र या इंस्टीट्यूट आजकल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। ये इंस्टीट्यूट नगर-महानगरों के युवाओं की योग्यता, क्षमता, उत्साह, आकांक्षा आदि का मजाक उड़ाते लगते हैं। यहां छात्रों के भविष्य और कीमती समय की चिन्ता करने की बजाय इंस्टीट्यूटों के मालिक केवल अधिकतम धन लूटने में लगे रहते हैं। नये पाठ्यक्रम, इंटर्नशिप, ट्रेनिंग, शिविर, रोजगार दिलाने, शैक्षिक यात्रा आदि विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यकता से अधिक धन वसूलना आम है।
राजधानी में अखबारों में कम शुल्क में कम्प्यूटर शिक्षा का धुंआधार विज्ञापन करने वाले एक उद्योगपति होटल मालिक के इंस्टीट्यूट के अच्छी शिक्षा के दावों में कितनी दम है यह बात भुक्तभोगी छात्र अपने कीमती ८-१० महीने और ‘कम फ़ीस’ बरबाद करने के बाद ही जान पाते हैं। यहां अंग्रेजी बोलचाल भी सिखाई जाती है। हां, फ़ीस के बदले कुछ खास नहीं सिखाया जाता, बस २-३ मोटी किताबें जरूर दे दी जाती हैं। आजकल छात्रों को फ़्री लैपटॉप देने की बात भी कही जा रही है। अक्सर इस संस्थान के ‘गुरुओं’ की आवश्यकता के विज्ञापन आते हैं जिनमें मासिक वेतन मात्र १०००० रुपये बताया जाता है। इसी तरह अनेक दुकानें चल रही हैं जिनसे सावधान रहने की ज़रूरत है।
बड़े शहरों में विशेष रूप से ऐसे धंधेबाज इंस्टीट्यूटों की बाढ़ आयी हुई है। यह भी देखने में आया है कि अनेक पाठ्यक्रमों में पूरे साल पढ़ने-पढ़ाने के बाद परीक्षा निकट आते ही बिना कारण बताये छात्रों का प्रवेश पत्र रोक लिया जाता है। कारण, वही मनमानी वसूली। धन मिलने पर ही प्रवेश पत्र दिया जाता है। इस प्रकार की ब्लैक मेलिंग तमाम इंस्टीट्यूटों में चलती है। अच्छीखासी धनराशि वसूलने के बाद ही छात्र को परीक्षा में बैठने दिया जाता है। ऐसे मामलों को लेकर छात्र और अभिभावक काफी परेशान होते हैं। आमतौर पर प्रवेश पत्र रोके जाने का कारण कक्षा में कम उपस्थिति बताने जैसा घिसापिटा बहाना ही बताया जाता है। भारीभररकम जुर्माना देने के बाद सब ठीक हो जाता है।
सम्पन्न अभिभावकों को इसप्रकार जुर्माना चुका पाने में दिक्कत नहीं होती। दिक्कत उन्हें होती है जो मध्य वर्गीय या गरीब होते हैं। जैसे-तैसे वे अपने बच्चों का भविष्य संवारने के सपने को साकार करने को साधन जुटाते हैं। एक मामले में इंजीनियरिंग का छात्र निराश होकर आत्महत्या के लिए भी विवश हो गया। उसने प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। सौभाग्य से उसकी बात सुनी गयी और उसे प्रशासन के हस्तक्षेप से प्रवेश पत्र मिल गया। पर सभी के साथ ऐसा नहीं हो पाता।
ऐसे छात्रों की संख्या कम नहीं है जो धंधेबाज इन्स्टीट्यूट संचालकों की मीठी बातों और झूठे वायदों-दावों में फंसकर मोटी राशि चुका देते हैं। ऐसे तमाम इन्स्टीट्यूट हैं जिनके पास न उपयुक्त भवन हैं न सही उपकरण या अन्य सुविधाएं। असलियत का पता प्रायः बाद में ही चलता है। इसी तरह लम्बी अवधि के पाठ्यक्रम के साथ-साथ क्रश कोर्स का दावा भी कई बार खोखला साबित होता है। इसके अलावा अवधि पूरी होने पर परीक्षा के बाद प्रमाण पत्र देने के नाम पर भी धन की मांग की जा सकती है। ऐसी ही तमाम समस्याओं से जूझते अनगिनत युवा अपना कैरियर बिगड़ने के डर से चुप रहते हैं और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।
शिक्षा और प्रशिक्षण की ऐसी दुकानों से सावधान रहना जरूरी हे। शतप्रतिशत रोजगार दिलाने का दम भरने वाले कितने इन्स्टीट्यूट अपना वायदा पूरा करते हैं, ईश्वर ही जाने। अच्छा यही है कि सम्बन्धित इन्स्टीट्यूट में प्रशिक्षण प्राप्त कर रह कुछ छात्रों से बातचीत करने के बाद ही यदि उचित लगे तो वहां प्रवेश लेना चाहिए। इन्स्टीट्यूट संचालक यह भलीभांति जानते हैं कि आज रोजगारपरक शिक्षा या प्रशिक्षण का जमाना है सो वे अपनी शैतानी बुद्धि का उपयोग छात्रों को ठगकर धन ऐंठने में करते हैं। पत्रकारिता और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निरन्तर बढ़ते आकर्षण के चलते तमाम धंधेबाज इन्स्टीट्यूटनुमा दुकानें खोलकर बैठ गये हैं। इनके पास प्रशिक्षण के लिए न उपयुक्त शिक्षक-प्रशिक्षक होते हैं और न ही सही साधन। अनेक टीवी चैनलों ने भी अपनी दुकानें खोल ली हैं।
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को लेकर तमाम मामले प्रकाश में आते हैं और अनेक लोग अदालतों की शरण में भी जाते हैं। यदि छात्र पाठ्यक्रमों से जुड़े सभी कागजात, लिखित अनुबन्ध, नियम, शर्तें, अन्य विवरण आदि प्रस्तुत करते हैं तभी उनका पक्ष मजबूत होता है। धंधेबाज और धोखेबाज इन्स्टीट्यूटों के बारे में शिकायत अवश्य करनी चाहिए। छात्रों को चाहिए कि वे प्रवेश लेने से पहले विश्वविद्यालय या अन्य सम्बन्धित विभाग आदि से मान्यता और सत्यता की जांच कर लेनी चाहिए। इसके अलावा पाठ्यक्रम सम्बन्धी विवरण लिखित में या छपा हुआ लें। मौखिक बातों पर भरोसा कभी न करें। इण्टरनेट की सुविधा के चलते भी धन्धेबाज लोग खूब लाभ उठा रहे हैं। अतः हर वेबसाइट में कही गयी बातों पर बिना सोचे-समझे-परखे आंख मूंदकर विश्वास करना नुकसानदायक सिद्ध हो सकता है। यदि कोई धन्धेबाजों की धोखेबाजी का शिकार बन जाए तो उसे चुप बैठने की बजाय और लोगों को बताने के साथ-साथ उपभोक्ता फोरम में पूरे विवरण के साथ अपना पक्ष अवश्य रखना चाहिए।      

मंगलवार, 15 मार्च 2011

दामाद

देश का दामाद

कौन है रॉबर्ट वडेरा, है कौन जो इसे जांच से छोड़ा
जाता है (देखें क्रम संख्या २३ और ३१)
यहां क्लिक करें

मंगलवार, 8 मार्च 2011

राष्ट्रीय चिन्ह

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ ऐसा
दैनिक जागरण में छपा एक समाचार, सौजन्य: नीरज दीवान

यहां क्लिक करें और मुस्कानदूत देखें

सोमवार, 7 मार्च 2011

मोलभाव

दस का चीनी माल 95 में 













मैंने हाल ही में चीन निर्मित आपात्कालीन एलईडी लाइट 95 रुपये में खरीदी। जबकि उसके डिब्बे पर अधिकतम खुदरा मूल्य 10 रुपये छपा हुआ है। इस सामान की रसीद भी नहीं दी जाती। इस तरह मूल्य 10 रुपये छापकर 95 रुपये में सामान बेचना जारी है और हमारी सरकार विज्ञापन देकर लोगों को अधिकतम खुदरा मूल्य पर दुकानदार से मोलभाव करने की सलाह देती है। इस तरह सामान बेचने के पीछे सम्भव है कोई बड़ी आर्थिक गड़बड़ी छिपी हो।
• वरुण
यहाँ क्लिक करके देखें युवाउमंग

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

डॉ. कमीशन

डॉक्टर हैं कि दलाल
मैं आपको ५०% डिस्काउण्ट अभी दे दूं या कमीशन के साथ 
पहली को घर भिजवा दूं!       * आम एक्स-रे एवं पैथोलॉजी लैब
Cartoon © T.C. Chander 2011 onwards
मेडीकल रिप्रेंजेंटेटिव यानी एम.आर.यानी किसी दवा कम्पनी का प्रतिनिधि जो अपने साथ अपनी कम्पनी की जरूरी/गैर जरूरी दवा का बाज़ार बनाने के लिए डॉक्टर दर डॉक्टर भटकता है। पिछले कुछ दशकों से एम.आर. का महत्व काफ़ी बढ़ गया है। ये अपनी दवाओं के बारे में डॉक्टरों को समझाते हैं और उन दवाओं की बिक्री बढ़ाने का प्रबन्ध करते हैं। ये दवा कंपनिया डॉक्टर को ४०-५०% तक नकद कमीशन और महंगे उपहार देती है। 
डॉक्टर आवश्यक-अनावश्यक रूप से खून, थूक, वीर्य आदि विभिन्न जांचें कराने के अलावा एक्स-रे, डिज़िटल एक्स-रे में कमीशन, विभिन्न प्रकार की जांचे करवाते है, ऑपरेशन करते-कराते है तो उसमे कमीशन खाते है। किसी अन्य विशेषज्ञ डॉक्टर या अस्कोपताल-नर्सिंग होम को मरीज को  रैफ़र करने में ३०-४०% कमीशन। दवा की दुकानों से कमीशन और उपहार। मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप जैसे कई रोगों में मरीज को आजीवन दवाओं के सहारे रहना पड़ता है। कोई डॉक्टर अपने मरीज को किसी दवा के दुष्परिणामों या साइड इफ़ैक्ट्स के बारे में नहीं बताता। अगर किसी दवा से मरीज पर कोई बुरा असर पड़ता है तो इससे डॉक्टर की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। 
आज भगवान का स्वरूप माने जाने वाले जितने डॉक्टर आप देखते हैं उनमें से ९६-९८% डॉक्टर कमीशन से ही अपने और अपने परिवार का शाही तरीके से पालन-पोषण कर रहे हैं भले ही इसके लिए अनगिनत लोगों का खून चूसना पड़ता हो या कमीनापन देना पड़ता हो। लोगों की मज़बूरी है कि यह जानते हुए भी कि हर तरह से लुटना ही है, डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है। यह जरूरी नहीं कि आपको सामान्य बुखार है तो आपका डॉक्टर बुखार की ही दवा दे। वह आपको टीबी घोषित करके ६-७ महीने दवाएं खिलाते हुए समय समय पर अनेक जांचें कराने को भी कह सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमारे देश में अधिकतम ३५० दवाओं की जरूरत है। और भारत में 84000 दवाएं बिक रही हैं। इसका अर्थ यही है कि हमारा डॉक्टर अनावश्यक रूप से वे गैरजरूरी दवाएं हमें खिलाते हैं जिनसे स्वयं उन्हें आर्थिक लाभ होता है। इसीलिए डॉक्टर इस तरह की दवाएं लेने की सिफ़ारिश करते हैं। ये दवाएं आम लोगों को खिलाई जाती है। कोई डॉक्टर खुद अपने या किसी परिजन के लिए उन दवाओं का इस्तेमाल नहीं करता। कारण, उनको इन दवाओं के साइड एफ़ैक्ट मालूम होते हैं। 
इस पूरी राम कहानी का सार यह है कि आज अधिकांश डॉक्टर दवा कम्पनियों, पैथॉलॉजीकल लैब, फ़िज़ियोथैरेपी केन्द्र आदि के दलाल बनकर रह गये हैं- रोगियों को लूटकर अपनी अनुचित काली कमाई बढ़ाने की खातिर।
• टी.सी. चन्दर

क्लिक करके देखिए- सहयात्रा- हिन्दी ब्लॉग पत्रिका

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

जानलेवा

खतरा
एक सरकारी विज्ञापन- खैनी, पान मसाला, तम्बाकू, गुटखा सभी जानलेवा हैं।
* इसीलिए सरकार इनका उत्पादन बन्द नहीं कर रही है। फ़िर डॉक्टरों, दवाखानों, दवा निर्माता-विक्रेताओं सहित  इन उद्योगों से जुड़े तमाम लोगों के बेरोज़गार होने का खतरा मोल नहीं लिया जा सकता।
विजय कुमार, नयी दिल्ली
............................................
देखिए-
सहयात्रा
हिन्दी ब्लॉग पत्रिका

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

दिल्ली जल बोर्ड

आज मिला दिल्ली जल बोर्ड का नीला पेय जल


२७ जनवरी, २०११ को मिला ऐसा पेय जल


   गणतन्त्र दिवस के अगले दिन यानी आज दिनांक २७ जनवरी, २०११ को सुबह जब दिल्ली जल बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाला पीने का पानी भरने के लिए मोटर चलायी तो आश्चर्यजनक रूप से नीले रंग का पेय जल आया। उल्लेखनीय है कि जमीनी मंजिल पर भी बिना मोटर बिल्कुल पानी नहीं आता। दूसरी ओर बिजली बचाने की सलाह दी जाती है। चूंकि नल में पानी आने का कोई घोषित समय नहीं है सो २४ घण्टों में अनेक बार मोटर चलाकर देखनी पड़ती है, ज़ाहिर है इसमें भी खूब बिजली बरबाद होती है।
दिल्ली जल बोर्ड ने समय-समय पर कत्थई, मटमैला, काला, पीला यानी रंग-बिरंगा पानी और आज नीला पेयजल उपलब्ध कराया है जो कल्पना से परे है। सरकार कहती है कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पेय जल का ही उपयोग करें। क्या ऐसा पानी पीना स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभप्रद है? दिल्ली जल बोर्ड की अध्यक्ष सहित कोई अधिकारी और कर्मचारी ऐसे रंग-बिरंगे पानी को पीकर दिखा सकता है क्या?
दिल्ली जल बोर्ड की लापरवाही के चलते तमाम लोग मिनरल वाटर के नाम पर मिलने वाले महंगे पानी का उपयोग करने को मज़बूर हैं। यह हाल तब है जब पहले की तुलना में पानी का बिल कई गुणा ज्यादा आता है।
हमारी सकार का एक और कमाल है- पानी के मीटर उपभोक्ता खुद खरीदकर लगाए, इसके लिए नोटिस भेजे गये थे। दूसरी ओर बिजली के मीटर चहेती कम्पनियों के द्वारा ही लगाए गये। यह सर्व विदित है कि ये मीटर तेज दौड़्ते हैं। शिकायत कीजिए, और तेज दौड़ने वाला मीटर आपके घर लग जाएगा। (ऐसा एक बिजली कर्मी ने ही बताया) आप कुछ नहीं कर सकते।
हमारे जन प्रतिनिधि अपने में मस्त हैं, चुनाव का मौसम आएगा तब होंगे हाज़िर!
स्थान: चाणक्य प्लेस, नयी दिल्ली