शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

गैस चोरी

ईण्डेन गैस की धड़ल्ले से चोरी
इस तरह होती है रसोईगैस की धड़ल्ले से चोरी











































और गैस बुक कराने के कई दिन बाद भी जब ग्राहक के घर गैस सिलेण्डर नही पहुंचता तो दिल्ली जैसे शहर यानी राजधानी में भी खाना इस तरह लकड़ी जलाकर बनाना पड़ता है।

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

कार्टून चोर


कार्टूनपन्ना (sulekha.com) में प्रदर्शित कई कार्टून चुराकर भारत के हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने अपने एक कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में उपयोग किया, वह भी मनमाने ढंग से फ़ेरबदल करके। इस बारे में बारबार लिखने-सम्पर्क करने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ। महीनों बाद जब इण्टरनेट पर मैंने लिखा और काफ़ी लोगों को ई-मेल भेजे तब चैनल के मुखिया का एक सन्देश आया जिसमें खेद व्यक्त किया गया था और मेहनताने/क्षतिपूर्ति के रूप में धन  भेजने को कहा था।
इस बात को भी कई माह बीत चुके हैं। यह हाल है आर्थिक रूप से सम्पन्न टीवी चैनल का जो अपने कर्म्चारियों को लाखो रुपये वेतन दे देता है, विज्ञापन आदि से कमाता भी है। साथ ही और भी व्यवसाय होंगे। मगर कार्टून चुराकर उपयोग करना ठीक लगता है। किसी रचनाकार की रचना का बिना अनुमति उपयोग करने मे जरा भी शर्म नहीं आती। ऐसा ही एक और उदाहरण है- मध्य प्रदेश से प्रकाशित होने वाले रंगीन हिन्दी दैनिक पीपुल्स समाचा का, इसमें भी मेरा एक कार्टून चुराकर छापा गया। कई बार पत्र लिखने पर भी चुप्पी छाई हुई है।
• चित्र : हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी में चुराए कार्टूनों की पृष्ठभूमि
कार्टून चोरी (दखलंदाजी में प्रकशित १७.०५.१०)

यहां दिया मेरा बनाया एक कार्टून मध्य प्रदेश से प्रकाशित हो रहे हिन्दी दैनिक अखबार पीपुल्स समाचार ने थोड़ा-सा बदलाव करके अपने कॉलम गुगली में (नीचे दिया लिन्क http://cartoonistchander.blogspot.com हटा कर) १५ मई २०१० को पृष्ठ ४ पर बिना अनुमति/बिना सूचना छाप दिया। यह गुस्ताखीमाफ़  में नियमित रूप से छपने वाले मेरे कार्टूनों में से एक है।
सम्पन्न-समर्थ होने पर भी मुफ़्त का माल उपयोग करने की प्रवृत्ति निन्दनीय है और किसी भी रचनाकार के अधिकारों का हनन तथा कॉपीराइट का उल्लंघन है।
चन्दर
देखें- १. छपा कार्टून २. मूल कार्टून (बड़े आकार में देखने के लिए छवियों पर क्लिक करें)

बुधवार, 12 जनवरी 2011

डिलीवरी

एजेंसी वालों का कहना है कि हलवाई को डिलीवरी दे चुके हैं, छोटे सिलेण्डर भरने वालों को देने के बाद हमारा नम्बर है।

आपके यहां भी ऐसा ही होगा। यह लिन्क भी क्लिक करके देखें-पढ़ें-
गैस 

कार्टून और चुटकुलों का आनन्द लेने के लिए यहां क्लिक करें।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

कार्टून व्यथा

दैनिक जागरण ने क्यों छापा कार्टून
छवि पर क्लिक कर बड़ा करके देखें




















मैं एक फ्रीलांस कार्टूनिस्ट हूँ दो चार पत्र-पत्रिकाओं में कार्टून देता हूँ और उसी मेहनताने से मेरा काम चलता है। पर जब कई समाचार पत्र मेरे कार्टून मेरी इजाजत और मेरे नाम के बिना धड़ल्ले से छाप लेते हैं यह देखकर दुःख होता है। हम जैसे असंगठित पढ़ेलिखे मजदूर कुछ नहीं कर पाते। कोर्ट-कचहरी में कॉपीराइट का मामला उठाकर सालों तक धन और समय बरबाद करना भी सभी के वश की बात नहीं। 
इन्टरनेट का प्रयोग कुछ लोग  क्या और कैसे करते हैं, यह इसी चीज का एक नमूना है।  कार्टून चुराकर छापना, ताकि मेहनताना न देना पड़े। यह प्रवृत्ति छोटे-बडए तमाम प्रकाशनों में है। इस समाज में संवेदनशील कलाकारों की जगह नहीं है, शायद समाज को बेईमान नेता, अफ़सर, व्यापारी और अपराधियों की ज्यादा जरूरत है। वसे भी कार्टून कला को प्रोत्साहन देने वाले सम्पादकों की प्रजाति ही लुप्तप्राय है, अब कमान हर चीज को बाज़ार बनाने वालों के हाथ में है। मालिक और बाजार के बाज़ीगर सम्पादक हो गये हैं और ये लोग ही पठनीय (?) सामग्री पर हावी रहते हैं। ऐसे में हेराफ़ेरी ही होगी। कार्टून चाहिए जरूर पर फ़ोकट में और कोई कुछ कहे भी नहीं। यह स्थिति सचमुच शर्मनाक है!
श्याम जगोता, नयी दिल्ली 

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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

पेय जल की बरबादी

चाणक्य प्लेस में दिल्ली जल बोर्ड के टेंकर का पेय जल इस लिए गली में बहा दिया गया कि वह बन्द हो जाने पर फ़िर स्टार्ट नहीं हो रहा था। पानी फ़ैलाने के बाद उसे धक्का मारकर स्टार्ट किया गया। इस चक्कर मेम मुफ़्त दिया जाने वाला बहुमूल्य पेयजल यूं ही बहा दिया गया। (१० दिसम्बर, २०१०)

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

चैनी-चैनी

तम्बाकू का विज्ञापन
टीवी पर रात लगभग १० बजे रोजाना चैनी नामक रेडीमेड तम्बाकू का विज्ञापन आता है "चैनी-चैनी" जो तम्बाकू के विज्ञापनों पर लगी रोक की सरकारी नीति का खुला उल्लंघन है। यह विज्ञापन एक लोकप्रिय कार्यक्रम के बीच में आता है जो रोचक ढंग से लटके-झटकेदार बनाया गया है। कुछ टीवी चैनलों पर आने वाला यह विज्ञापन दर्शकों को सहज ही आकर्षित कर लेता है। है कोई रोकने वाला?
• वी. कुमार, नयी दिल्ली

पानी

पानी रे पानी तेरा रंग देखा
पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है।

फ़ोटो: 500 मिली. की पानी की बोतल मात्र 25 रुपये में!

आजकल पानी एक चर्चा का विषय बन चुका है। पीने योग्य पानी यानी पेय जल को लेकर पूरी दुनिया में चिन्ता पसरी हुई है। कहा यह भी जा रहा है कि अगला विश्व हुआ तो वह पानी को लेकर ही होगा। यह स्थिति तब है जब धरती का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से भरा हुआ है। गांव हो या शहर सभी जगह पानी की परेशानी दिखाई देती है। पानी को लेकर एक परेशानी उसके प्रदूषित होने से भी है। विश्व के कुल पानी का लगभग 97 प्रतिशत समुद्री पानी है जो पीने लायक नहीं है।

पेय जल के रूप में उपयोग किया जा सकने वाला नदियों, झीलों, तालाबों आदि के अलावा वर्फ के रूप में मौजूद और भूमिगत जल है। सिंचाई में पानी का एक बड़ा भाग प्रयुक्त होता है। इसके अलावा विभिन्न उद्योगों और अनेक अन्य कार्यों में भी काफी मात्रा में पानी काम का उपयोग होता है। पानी और उसके उपयोग-दुरुपयोग के अलावा इसके निरन्तर प्रदूषित होते जाने को लेकर अब अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं जो विश्व व्यापी हैं। दूसरी बड़ी समस्या है विभिन्न स्थानों पर पानी की उपलब्धता में भारी अन्तर का होना। हमारे देश में भी पानी की असमान उपलब्धता मौजूद है। कहीं पानी अच्छी मात्रा में उपलब्ध है तो कहीं पानी की बेहद कमी है।

गर्मी के मौसम में अधिकांश जल स्रोत सूख जाते हैं। फलस्वरूप जल संकट गहरा जाता है। पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों में तकरार शुरू हो जाती है। देश की नदियों को परस्पर जोड़कर जल की असमानता की समस्या का हल निकालने के लिए सन् 1952 में नेशनल वाटर ग्रिड की स्थापना की गयी। पर यह योजना सफल नहीं हो सकी। कुछ साल पहले भी नदियों को जोड़ने की योजना तैयार हुई पर यह भी अभी तक सिरे नहीं चढ़ी है।

अनुमान है कि कुछ समय में ही ऐसी स्थिति हो जाएगी कि विश्व के लगभग 40 देशों में पानी का भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। आज भी हमारे यहां अधिकांश क्षेत्रों में जरूरत से काफी कम मात्रा में लोगों को पानी मिल पा रहा है। गांव हो या शहर कमोवेश एक जैसी ही स्थिति देखने को मिलती है। बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती जरूरत के अनुपात में पानी की उपलब्धता घटती जा रही है। बदलते मौसम के मिजाज के लिए लोगों का आचरण भी कम जिम्मेदार नहीं है। बढ़ते प्रदूषण ने समस्या को और बढ़ा दिया है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण ने भी नकारात्मक भूमिका ही निभायी है। अधिकांश स्थानों पर बढ़ते जमीनी प्रदूषण के चलते पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।


उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है।

पानी की दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था, रिसाव आदि के चलते नियमित रूप से काफी बरबादी होती है। वितरण व्यवस्था में सही बदलाव लाकर सुधार करने में खर्च भी काफी होगा। दशकों पुरानी पाइप लाइनों को बदलना आसान काम नहीं है। स्थानीय स्तर पर पानी की व्यवस्था करने के लिए प्रयुक्त होने वाला जमीनी पानी अब जमीन के काफी नीचे पहुंच गया है। जिन स्थनों पर मात्र 1 दशक पहले 40-45 फुट गहराई में पानी उपलब्ध था, वहीं अब लगभग 200 फुट खोदने पर भी पानी नहीं मिलता। यही नहीं गुजरात में कच्छ क्षेत्र में खोदे गये 10 में से 6 नलकूपों में 1200 फुट जमीन के नीचे भी पानी नहीं मिला। अनेक नगरों में स्थानीय प्राशासन द्वारा लगाए गये हैंडपम्प बेकार हो चुके हैं। पानी को लेकर परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जगह-जगह ट्रेनों और टैंकरों से पानी पहुचाना पड़ रहा है। यही व्यवस्था राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों के करीब 128 गांवों के निवासियों के लिए जीवनदायिनी बनी हुई है।

देश के अनेक भाग ऐसे हैं जिनमें कुछ में जल्दी ही और कुछ क्षेत्रों में थोड़े वर्षों में ही पानी की उपलब्धता न के बराबर हो जाएगी। ऐसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है। बढ़ती शराब की खपत के कारण अधिक शराब बनायी जाती है। सरकारों को टैक्स मिलता है, निर्माता जमकर धन कमाते हैं। पर शराब निर्माण के दौरान प्रयुक्त हुआ पानी प्रायः पास की नदी में बहा दिया जाता है। यही हाल कपड़ों की रंगाई फैक्टरियों, टैनरिओं और अन्य उद्योगों का है। सिर्फ नियम-कानून बनाने से सब ठीक नहीं हो जाता। उन पर अमल करने-कराने की इच्छाशक्ति भी सम्बन्धित व्यक्तियों में होना जरूरी है।

प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और नष्ट किये जा रहे हैं। उन स्थानों की ज़मीन का उपयोग रिहायशी और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। बहुमंजिले भवन खेतों, जंगलों और हरियाली को निगलते जा रहे हैं। धन्नासेठ और भ्रष्ट लोग सड़क किनारे की और अन्य उपजाऊ जमीन खरीदकर अपना कब्जा किए जा रहे हैं।

पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है। भूल जाइए कि स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाएं और समर्थ लोग आपके लिए प्याऊ बनवाकर मुफ्त पानी उपलब्ध कराकर आपकी प्यास बुझाएंगे। पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करने का पुण्य अब कितने लोग कमा रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। बचीखुची प्याऊ भी कुछ समय बाद गायब हो जाएंगी। पानी की बोतल सम्बन्धित कम्पनी के प्रचार से बनी छवि के अनुरूप आपक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग बनती जा रही है।

आज एक फलताफूलता व्यवसाय है। मोटे मुनाफे को देख इस क्षेत्र में हर लल्लूपंजू कूद पड़ा है। प्रकृति प्रदत्त जल की मुफ्त उपलब्धता आमजन के लिए दूभर होती जा रही है। पानी का व्यवसाय विश्व के लगभग 130 देशों में जमकर हो रहा है। यही नही, झील, तालाब और जमीनी पानी सब इन धंधेबाजों के कब्जे में है और सम्भावना भी यही है कि आने वाले समय में पूरी तरह इन्हीं के कब्जे में हो जाएगा। जल की आपर्ति से अधिक उसकी आवश्यकता है। सम्पन्न लोग विभिन्न कार्यों में पानी की आवश्यकता से कहीं अधिक खपत करते हैं। यह सीधेसीधे पानी का दुरुपयोग है।
पानी का संकट विश्व व्यापी है। इसके लिए जिम्मेदार भी हमारा आचरण ही है। असीम गंदगी फैलाने के बाद नदी-तालाबों की सफाई की ओर ध्यान दिया जा रहा है पर इसमें भी कर्त्तव्य के स्थान पर धंधा शामिल है। सैकड़ों करोड़ के खर्च के बाद भी नतीजा वही ढाक के तीन पात बना रहता है। फिर नयी योजनाएं बनती हैं, कर्ज लिया जाता है पर कुछ उल्लेखनीय नहीं हो पाता। आमजन वोट देने के बाद अपनी भूमिका से निवृत हो जाता है। इसके बाद हमारे जनप्रतिनिधि अपनी भूमिका यदि सही ढंग से निभाएं तो स्थिति में काफी बदलाव आ सकता है। यह सर्वविदित है कि स्वार्थ और धन के लालच से अपने कर्त्तव्य से विचलित होने में कितनी देर लगती है!

सहयात्रा

• टी.सी. चन्दर