शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

पेय जल की बरबादी

चाणक्य प्लेस में दिल्ली जल बोर्ड के टेंकर का पेय जल इस लिए गली में बहा दिया गया कि वह बन्द हो जाने पर फ़िर स्टार्ट नहीं हो रहा था। पानी फ़ैलाने के बाद उसे धक्का मारकर स्टार्ट किया गया। इस चक्कर मेम मुफ़्त दिया जाने वाला बहुमूल्य पेयजल यूं ही बहा दिया गया। (१० दिसम्बर, २०१०)

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

चैनी-चैनी

तम्बाकू का विज्ञापन
टीवी पर रात लगभग १० बजे रोजाना चैनी नामक रेडीमेड तम्बाकू का विज्ञापन आता है "चैनी-चैनी" जो तम्बाकू के विज्ञापनों पर लगी रोक की सरकारी नीति का खुला उल्लंघन है। यह विज्ञापन एक लोकप्रिय कार्यक्रम के बीच में आता है जो रोचक ढंग से लटके-झटकेदार बनाया गया है। कुछ टीवी चैनलों पर आने वाला यह विज्ञापन दर्शकों को सहज ही आकर्षित कर लेता है। है कोई रोकने वाला?
• वी. कुमार, नयी दिल्ली

पानी

पानी रे पानी तेरा रंग देखा
पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है।

फ़ोटो: 500 मिली. की पानी की बोतल मात्र 25 रुपये में!

आजकल पानी एक चर्चा का विषय बन चुका है। पीने योग्य पानी यानी पेय जल को लेकर पूरी दुनिया में चिन्ता पसरी हुई है। कहा यह भी जा रहा है कि अगला विश्व हुआ तो वह पानी को लेकर ही होगा। यह स्थिति तब है जब धरती का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से भरा हुआ है। गांव हो या शहर सभी जगह पानी की परेशानी दिखाई देती है। पानी को लेकर एक परेशानी उसके प्रदूषित होने से भी है। विश्व के कुल पानी का लगभग 97 प्रतिशत समुद्री पानी है जो पीने लायक नहीं है।

पेय जल के रूप में उपयोग किया जा सकने वाला नदियों, झीलों, तालाबों आदि के अलावा वर्फ के रूप में मौजूद और भूमिगत जल है। सिंचाई में पानी का एक बड़ा भाग प्रयुक्त होता है। इसके अलावा विभिन्न उद्योगों और अनेक अन्य कार्यों में भी काफी मात्रा में पानी काम का उपयोग होता है। पानी और उसके उपयोग-दुरुपयोग के अलावा इसके निरन्तर प्रदूषित होते जाने को लेकर अब अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं जो विश्व व्यापी हैं। दूसरी बड़ी समस्या है विभिन्न स्थानों पर पानी की उपलब्धता में भारी अन्तर का होना। हमारे देश में भी पानी की असमान उपलब्धता मौजूद है। कहीं पानी अच्छी मात्रा में उपलब्ध है तो कहीं पानी की बेहद कमी है।

गर्मी के मौसम में अधिकांश जल स्रोत सूख जाते हैं। फलस्वरूप जल संकट गहरा जाता है। पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों में तकरार शुरू हो जाती है। देश की नदियों को परस्पर जोड़कर जल की असमानता की समस्या का हल निकालने के लिए सन् 1952 में नेशनल वाटर ग्रिड की स्थापना की गयी। पर यह योजना सफल नहीं हो सकी। कुछ साल पहले भी नदियों को जोड़ने की योजना तैयार हुई पर यह भी अभी तक सिरे नहीं चढ़ी है।

अनुमान है कि कुछ समय में ही ऐसी स्थिति हो जाएगी कि विश्व के लगभग 40 देशों में पानी का भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा। आज भी हमारे यहां अधिकांश क्षेत्रों में जरूरत से काफी कम मात्रा में लोगों को पानी मिल पा रहा है। गांव हो या शहर कमोवेश एक जैसी ही स्थिति देखने को मिलती है। बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती जरूरत के अनुपात में पानी की उपलब्धता घटती जा रही है। बदलते मौसम के मिजाज के लिए लोगों का आचरण भी कम जिम्मेदार नहीं है। बढ़ते प्रदूषण ने समस्या को और बढ़ा दिया है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगीकरण ने भी नकारात्मक भूमिका ही निभायी है। अधिकांश स्थानों पर बढ़ते जमीनी प्रदूषण के चलते पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।


उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है।

पानी की दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था, रिसाव आदि के चलते नियमित रूप से काफी बरबादी होती है। वितरण व्यवस्था में सही बदलाव लाकर सुधार करने में खर्च भी काफी होगा। दशकों पुरानी पाइप लाइनों को बदलना आसान काम नहीं है। स्थानीय स्तर पर पानी की व्यवस्था करने के लिए प्रयुक्त होने वाला जमीनी पानी अब जमीन के काफी नीचे पहुंच गया है। जिन स्थनों पर मात्र 1 दशक पहले 40-45 फुट गहराई में पानी उपलब्ध था, वहीं अब लगभग 200 फुट खोदने पर भी पानी नहीं मिलता। यही नहीं गुजरात में कच्छ क्षेत्र में खोदे गये 10 में से 6 नलकूपों में 1200 फुट जमीन के नीचे भी पानी नहीं मिला। अनेक नगरों में स्थानीय प्राशासन द्वारा लगाए गये हैंडपम्प बेकार हो चुके हैं। पानी को लेकर परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। जगह-जगह ट्रेनों और टैंकरों से पानी पहुचाना पड़ रहा है। यही व्यवस्था राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों के करीब 128 गांवों के निवासियों के लिए जीवनदायिनी बनी हुई है।

देश के अनेक भाग ऐसे हैं जिनमें कुछ में जल्दी ही और कुछ क्षेत्रों में थोड़े वर्षों में ही पानी की उपलब्धता न के बराबर हो जाएगी। ऐसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु आदि राज्यों के अनेक क्षेत्रों में आज नहीं तो कल जल संकट उत्पन्न होना ही है। नदियों का यह हाल है कि उनमें कारखानों के करोड़ों लीटर दूषित पानी को बहा दिया जाता है। शहर-कस्बों के नाले नदियों में गिर रहे हैं। अनेक नदियां ऐसी हो गयी हैं कि उनका पानी पीने की बात छोड़िए नहाने लायक भी नहीं रह गया है। बढ़ती शराब की खपत के कारण अधिक शराब बनायी जाती है। सरकारों को टैक्स मिलता है, निर्माता जमकर धन कमाते हैं। पर शराब निर्माण के दौरान प्रयुक्त हुआ पानी प्रायः पास की नदी में बहा दिया जाता है। यही हाल कपड़ों की रंगाई फैक्टरियों, टैनरिओं और अन्य उद्योगों का है। सिर्फ नियम-कानून बनाने से सब ठीक नहीं हो जाता। उन पर अमल करने-कराने की इच्छाशक्ति भी सम्बन्धित व्यक्तियों में होना जरूरी है।

प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और नष्ट किये जा रहे हैं। उन स्थानों की ज़मीन का उपयोग रिहायशी और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। बहुमंजिले भवन खेतों, जंगलों और हरियाली को निगलते जा रहे हैं। धन्नासेठ और भ्रष्ट लोग सड़क किनारे की और अन्य उपजाऊ जमीन खरीदकर अपना कब्जा किए जा रहे हैं।

पानी की पहचान बोतल और टैंकरों में सिमटती जा रही है। होना यही है कि जिसके पास पैसा है, पानी उसका। घर से बाहर निकलकर आप बस स्टॉप, बस अड्डा, बाजार, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, शापिंग माल, सिनेमा हाल, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तर या जहां कहीं भी जाएं राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की पानी की बोतलें मिलेंगी या ठंडे पेय की बोतलें। इनके लिए पानी है जिसके लिए आपको अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है। भूल जाइए कि स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाएं और समर्थ लोग आपके लिए प्याऊ बनवाकर मुफ्त पानी उपलब्ध कराकर आपकी प्यास बुझाएंगे। पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करने का पुण्य अब कितने लोग कमा रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। बचीखुची प्याऊ भी कुछ समय बाद गायब हो जाएंगी। पानी की बोतल सम्बन्धित कम्पनी के प्रचार से बनी छवि के अनुरूप आपक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग बनती जा रही है।

आज एक फलताफूलता व्यवसाय है। मोटे मुनाफे को देख इस क्षेत्र में हर लल्लूपंजू कूद पड़ा है। प्रकृति प्रदत्त जल की मुफ्त उपलब्धता आमजन के लिए दूभर होती जा रही है। पानी का व्यवसाय विश्व के लगभग 130 देशों में जमकर हो रहा है। यही नही, झील, तालाब और जमीनी पानी सब इन धंधेबाजों के कब्जे में है और सम्भावना भी यही है कि आने वाले समय में पूरी तरह इन्हीं के कब्जे में हो जाएगा। जल की आपर्ति से अधिक उसकी आवश्यकता है। सम्पन्न लोग विभिन्न कार्यों में पानी की आवश्यकता से कहीं अधिक खपत करते हैं। यह सीधेसीधे पानी का दुरुपयोग है।
पानी का संकट विश्व व्यापी है। इसके लिए जिम्मेदार भी हमारा आचरण ही है। असीम गंदगी फैलाने के बाद नदी-तालाबों की सफाई की ओर ध्यान दिया जा रहा है पर इसमें भी कर्त्तव्य के स्थान पर धंधा शामिल है। सैकड़ों करोड़ के खर्च के बाद भी नतीजा वही ढाक के तीन पात बना रहता है। फिर नयी योजनाएं बनती हैं, कर्ज लिया जाता है पर कुछ उल्लेखनीय नहीं हो पाता। आमजन वोट देने के बाद अपनी भूमिका से निवृत हो जाता है। इसके बाद हमारे जनप्रतिनिधि अपनी भूमिका यदि सही ढंग से निभाएं तो स्थिति में काफी बदलाव आ सकता है। यह सर्वविदित है कि स्वार्थ और धन के लालच से अपने कर्त्तव्य से विचलित होने में कितनी देर लगती है!

सहयात्रा

• टी.सी. चन्दर

बुधवार, 8 सितंबर 2010

गैस

गैस एजेंसियों की बदमाशी की खुली पोल
उपभोक्ता कभी भी भरा हुआ गैस सिलेण्डर प्राप्त कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि गैस कम्पनियों की ओर से दो बार गैस लेने के बीच दिनों के अंतराल की कोई बाध्यता लागू नहीं है।

हर गैस एजेंसी पर गैस बुक कराने पर बताया जाता है कि अगला सिलेण्डर १८ २१ दिन के अंतराल के बाद ही मिलेगा। वास्तविकता यह है कि किसी गैस कम्पनी ऐसा कोई नियम ही नहीं है। दसियों साल से यही बताया जाता रहा है। १८ और २१ दिन बाद नया भरा गैस सिलेण्डर देने का नियम गैस एजेंसियों ने अपने लाभ के लिए स्वयं बनाया है। गैस कम्पनियों की ओर से उपभोक्तों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं बनाया गया है। उपभोक्ता अपनी ज़रूरत के अनुसार कभी भी बुक कराकर गैस ले सकता है। यह जानकारी सूचना के अधिकार के अन्तर्गत इण्डियन ऑयल और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम की ओर से दी गयी है।

इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन के पत्र- पीएसओ/एलपीजी/आरटीआई दिनांक १६ दिसम्बर, २००९ में यह कहा गया है उपभोक्ता कभी भी भरा हुआ गैस सिलेण्डर प्राप्त कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि गैस कम्पनियों की ओर से दो बार गैस लेने के बीच दिनों के अंतराल की कोई बाध्यता लागू नहीं है। यही नियम कमर्शियल गैस सिलेण्डरों के लिए भी है। हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के पत्र- एलपीजी/एसएम/आरटीआई दिनांक १२ दिसम्बर, २००९ में भी यही बात कही गयी है।

सूचना के अधिकार पर काम करने वाले आरके गर्ग ने गैस एजेंसियों की मनमानी की असलियत जानने के लिए आरटीआई के अन्तर्गत प्राप्त की है। आमजन को सजग बनाने के लिए यह जानकारी वेबसाइट (यहां क्लिक करें) www.rtiindia.org पर भी उपलब्ध है।
इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन का टोल फ़्री नम्बर १८०० २३३३ ५५५ (1800 2333 555)
प्रस्तुति: विशाल

शुद्धता

ग्राहकों का अधिकार
लापरवाही
बरतें, उत्पाद की शुद्धता सुनिश्चित करें

ग्राहकों का अधिकार है कि वह दुकान के बांट माप का प्रमाण पत्र दुकान से मांग सकता है। पेट्रोल, डीजल पम्प से तेल लेते समय तौल में संदेह होने पर ग्राहक इस बात की मांग कर सकता है कि पहले डिब्बे में तेल दिया जाए और उसे वाहन में डाला जाए। पेट्रोल पम्प पर ग्राहकों के लिए पीने का पानी और वाहन के पहियों में मुफ्त हवा भरने की व्यवस्था होनी चाहिए। रसोई गैस सिलेण्डर देने से पहले उसे ग्राहक के सामने स्प्रिंग बैलेंस से तौलना जरूरी है। व्यापारिक, व्यावसायिक तथा कृषि उत्पादों के लेन देन में मानक बांट माप का ही प्रयोग होना चाहिए।

छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यवसाइयों को हर साल अपने बांटों का प्रमाणीकरण कराना चाहिए। अपनी बांट-माप के सत्यापन का प्रमाणपत्र दुकान पर अवश्य रखें। अगर विभाग के लोग मानकों की जांच के लिए नहीं आते तो अपनी बांट के सत्यापन के लिए विभाग तक जाएं और प्रमाणपत्र प्राप्त करें। रसोई गैस (एलपीजी) सिलेण्डर के हॉकर अपने पास स्प्रिंग बैलेंस जरूर रखें और उसकी भी नियमित जांच करवाते रहें। दुकानदार तथा व्यापारी किसी भी सूरत में अपनी बांट-माप का प्रमाण पत्र लेने में लापरवाही न बरतें। घरेलू गैस एलपीजी सिलेण्डर को तौलने के लिए स्प्रिंग बैलेंस में किसी तरह की छेड़छाड़ न करें। मानकों को दरकिनार कर उपयोग किये जा रहे बाट- माप के लिए दुकानदारों को दण्डित किया जा सकता है। मिठाई विक्रेताओं द्वारा मिठाई तथा डिब्बे की तौल एक साथ नहीं करनी चाहिए। पेट्रोल पम्प कर्मी मीटर शून्य करने के बाद ही ग्राहकों को तेल दें। पम्प मालिक उत्पाद की शुद्धता सुनिश्चित करें। दुकानों पर उपलब्ध पैकेट तथा पेय पदार्थ की बोतलों पर वस्तु का अधिकतम विक्रय मूल्य एमआरपी सभी करों सहित अंकित होता है। उससे ज्यादा कीमत पर दुकानदार नहीं बेच सकता। खरीदे गए डिब्बा बन्द पदार्थ के माप पर संदेह होने पर उसकी माप के लिए ग्राहक दबाव बना सकता है। पैकेट पर निर्माण की तिथि, बनाने वाले का नाम तथा उसका पूरा पता साफ लिखा होना चाहिए। अलग से लगे स्टीकर या स्लिप अमान्य है। पेट्रोल पम्प पर ग्राहक डिब्बे में तेल दिये जाने की मांग कर सकता है। पीने के पानी और वाहन के पहियों में हवा भरने की मुफ्त व्यवस्था होनी चाहिए। घटतौली या दुकान के बांट में किसी भी तरह की शंका होने पर ग्राहक बाट माप विभाग के टोल फ्री नम्बर पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। ग्राहक विभाग के टोल फ्री हेल्प लाइन टेलीफोन नम्बर- 18001805512 पर घटतौली की शिकायत कर सकते हैं। इसके अलावा ग्राहक सीधे कार्यालय में प्रार्थनापत्र देकर भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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गुरुवार, 17 जून 2010

प्रेस

जब बारूद लगा अखबारों की बिल्डिंगें उड़ाई गयीं
सरकार को भी सोचना चाहिए कि अखबारों को सस्ती दर पर जमीनें क्यों दी जाएं?
अखबार वैसे तो एक मिशन के रूप में जाना जाता रहा है जिसका काम आम लोगों के हित साधना है लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में अब यह एक व्यवसाय का रूप ले चुका है। आम आदमी के मन में भी अखबार के प्रति यही सोच बलवती होने लगी है तो इसकी वजह बड़े अखबारों का व्यवहार है जो अखबार के लिए दी गई सरकारी जमीन के उपयोग से सीधे परिलक्षित होती है। अमृत संदेश हो या नवभारत, देशबंधु हो या दैनिक भास्कर यहां तक कि तरुण छत्तीसगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ में यही हाल है। अखबार के दफ्तर कम काम्पलेक्स नजर आने वाले ये मीडिया वाले भले गलतफहमी पाल ले कि इससे आम लोग में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन लोग जानते हैं कि अखबार खोलने के नाम पर दी गई सरकारी जमीनों को दादागिरी के दम पर कैसे काम्पलेक्स में बदला जा रहा है।
पिछले कुछ दिनों से भास्कर के १४ माले के काम्पलेक्स की राजधानी में जमकर चर्चा है और यह भी कहा जा रहा है कि इसके भूउपयोग से लेकर नक्शे तक की स्वीकृति में जमकर दादागिरी चली है और यह चर्चा सच है तो सरकार को भी सोचना चाहिए कि अब अखबारों को सस्ती दर पर जमीनें क्यों दी जाए।

एक अखबार वाले ने तो नई राजधानी में ही नए प्रेस काम्पलेक्स का प्रस्ताव बना लिया है जबकि शुक्ला पेट्रोल पम्प को दूसरे जगह जमीन देने पर बस स्टैण्ड की जमीन खाली करने की खबरें इसी के यहां सबसे यादा छपती रही है।
प्रस्तुतकर्ता: लिन्क- कौशल तिवारी 'मयूख'
देश की राजधानी दिल्ली में भी यही हाल है।

गुरुवार, 10 जून 2010

एमटीएस ब्लेज़

एमटीएस ब्लेज़: सबसे महंगी इण्टरनेट सेवा
कुछ समय पहले मैंने बहु प्रचारित एमटीएस ब्राण्ड का बेतार का 3400 रुपये मूल्य का इण्टरनेट उपकरण लिया था। योजना के अनुसार कम्पनी की ओर से 1500 रुपये मूल्य की सर्फ़िंग मुफ़्त थी। यहमुफ़्तसेवा खत्म होने के बाद मैंने 200 एमबी का 198 रुपये मूल्य का छोटा रिचार्ज कराया। यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि 2-3 -मेल भेजने और कुछ वेबसाइटें देखने में लगे 35-40 मिनिट में ही 100 एमबी खर्च हो गये। सम्बन्धित डीलर को भी इस बारे में बताया तो उसे भे आश्चर्य हुआ, उसने अपने कम्प्यूटर पर इस बात की जांच भी की और पाया कि 200 एमबी में से अब मात्र 28 एमबी बचे हैं। उसने कम्पनी को फ़ोन कर इस बारे में बताने को कहा। 2-4 बार इण्टरनेट खोलने बन्द करके देखने पर पता चला कि इसमें भी हर बार 1-3 एमबी खर्च हो जाते हैं। इस प्रकार लगभग 1 घण्टे में 200 रुपये की एमटीएस की तेज इण्टरनेट सेवा का भरपूर आनन्द मैंने प्राप्त किया। एमटीएस से सम्पर्क करने के लिए अनेक बार फ़ोन किया। इस सेवा में इतने पुंछल्ले हैं कि ग्राहक परेशान होकर पीछा छोड़ दे साथ ही फ़ोन करने में खर्च भी करे। अन्त में एमटीएस केकष्ट मरकेयर और अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों को -मेल किया गया।

मैं एमटीएस की इण्टरनेट सेवा का आनन्द लेना चाहूं तो एक नौकरी सिर्फ़ एमटीएस के लिए करनी पड़ेगी क्योंकि यदि मैं कम से कम 2 घण्टे र्फ़िंग करता हूं (इसमें डाउन लोडिंग शामिल नहीं है) तो मुझे लगभग 400 रुपए यानी एक महीने में 12000 या उससे भी अधिक राशि खर्च करनी होगी। एमटीएस सीडीएमए आधारित सेवा है जो इतनी महंगी है। इसकी टैरिफ़ ही खतरनाक है जिसमें अनलिमिटेड का विकल्प नहीं है। गलती यही हुई कि पूरी जानकारी प्राप्त किए बिना मैंने एमटीएस पर भरोसा करके यह सेवा ले ली। सबसे महंगी एमटीएस (उपभोक्ता संख्या एमटीएस ब्लेज़- 9136951473) को भेजे गये -मेल का आजतक कोई जवाब नहीं आया है।

देश में आम आदमी को सस्ती और स्तरीय इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने की दिशा में यह कैसी कोशिश है? लगभग हर सेवा प्रदाता की टैरिफ़ ही पेचीदा दिखाई देती है। इसे सरल और सस्ता बनाया जाना चाहिए।
-मेल: custumercare.del@mtsindia.in, nodal.del@mtsindia.in, appellate.del@mtsindia.in
वरुण कुमार, नयी दिल्ली