शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

दिल्ली जल बोर्ड

आज मिला दिल्ली जल बोर्ड का नीला पेय जल


२७ जनवरी, २०११ को मिला ऐसा पेय जल


   गणतन्त्र दिवस के अगले दिन यानी आज दिनांक २७ जनवरी, २०११ को सुबह जब दिल्ली जल बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाला पीने का पानी भरने के लिए मोटर चलायी तो आश्चर्यजनक रूप से नीले रंग का पेय जल आया। उल्लेखनीय है कि जमीनी मंजिल पर भी बिना मोटर बिल्कुल पानी नहीं आता। दूसरी ओर बिजली बचाने की सलाह दी जाती है। चूंकि नल में पानी आने का कोई घोषित समय नहीं है सो २४ घण्टों में अनेक बार मोटर चलाकर देखनी पड़ती है, ज़ाहिर है इसमें भी खूब बिजली बरबाद होती है।
दिल्ली जल बोर्ड ने समय-समय पर कत्थई, मटमैला, काला, पीला यानी रंग-बिरंगा पानी और आज नीला पेयजल उपलब्ध कराया है जो कल्पना से परे है। सरकार कहती है कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पेय जल का ही उपयोग करें। क्या ऐसा पानी पीना स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभप्रद है? दिल्ली जल बोर्ड की अध्यक्ष सहित कोई अधिकारी और कर्मचारी ऐसे रंग-बिरंगे पानी को पीकर दिखा सकता है क्या?
दिल्ली जल बोर्ड की लापरवाही के चलते तमाम लोग मिनरल वाटर के नाम पर मिलने वाले महंगे पानी का उपयोग करने को मज़बूर हैं। यह हाल तब है जब पहले की तुलना में पानी का बिल कई गुणा ज्यादा आता है।
हमारी सकार का एक और कमाल है- पानी के मीटर उपभोक्ता खुद खरीदकर लगाए, इसके लिए नोटिस भेजे गये थे। दूसरी ओर बिजली के मीटर चहेती कम्पनियों के द्वारा ही लगाए गये। यह सर्व विदित है कि ये मीटर तेज दौड़्ते हैं। शिकायत कीजिए, और तेज दौड़ने वाला मीटर आपके घर लग जाएगा। (ऐसा एक बिजली कर्मी ने ही बताया) आप कुछ नहीं कर सकते।
हमारे जन प्रतिनिधि अपने में मस्त हैं, चुनाव का मौसम आएगा तब होंगे हाज़िर!
स्थान: चाणक्य प्लेस, नयी दिल्ली

बीबीसी हिन्दी सेवा

बीबीसी हिन्दी रेडियो अब नहीं गूंजेगा

बीबीसी हिन्दी रेडियो अब नहीं गूंजेगा। इस बारे में बीबीसी की तरफ से आधिकारिक घोषणा भी हो गयी है। बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हॉरॉक्स ने कहा है कि सरकारी फंडिंग में अहम कटौती की वजह से ये परिवर्तन किए जा रहे हैं। इसी वजह से बीबीसी रेडियो सर्विस को भी बन्द किया जा रहा है। यह घोषणा करते हुए देश-विदेश में रह रहे बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा के लाखों– करोड़ों श्रोताओं की भावनाओं की पूर्णतया अनदेखी कर दी गयी। मीडिया खबर ने बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा को बंद करने के विरुद्ध  एक अभियान छेड़ा है और बीबीसी से आग्रह किया है कि वह बीबीसी हिन्दी रेडियो को बंद न करे। इस सम्बन्ध में आप भी इस ऑनलाइन पेटिशन पर अपने दस्तखत कर बीबीसी हिन्दी रेडियो को बचाने की मुहिम में साथ दें।
बीबीसी बचाओ

इस बारे मेरं अपने मित्रों को अवश्य बताएं। उन्हें यह सन्देश ई-मेल करें।

रविवार, 23 जनवरी 2011

सीनियर इंडिया

सीनियर इंडिया ने मारा मेरा मेहनताना
कुछ दिन पहले अखबार में खबर छपी कि ’सीनियर बिल्डर’ गिरफ़्तार। पढ़कर आश्चर्य नहीं हुआ।  ऐसा होना ही था। सीनियर बिल्डर लिमिटेड यानी एसबीएल कम्पनी मालिक विजय दीक्षित सीनियर मीडिया के भी मालिक हैं। सीनियर मीडिया की पाक्षिक हिन्दी पत्रिका ’सीनियर इंडिया‍’ के लिए मैंने तत्कालीन सम्पादक और पुराने पत्रकार (दैनिक लोकमत समाचार, नागपुर के पूर्व सम्पादक और मेरे कुछ परिचित) एस.एस विनोद के कहने पर बन्द पड़ी पत्रिका को फ़िर शुरू करने में सहयोग की खातिर ३ दिन लगातार रात-दिन काम किया। इस दौरान मैं अपने एक डिज़ाइनर मित्र और अन्य लोगों के साथ डिफ़ेंस कॉलोनी स्थित पत्रिका कार्यालय में ही रहा। यह पत्रिका मेरे दैनिक जनसत्ता के साथी पत्रकार और सीनियर इंडिया के सम्पादक आलोक तोमर द्वारा एक कार्टून छापने के विवाद या अन्य कारण से उनकी विदाई के बाद बन्द पड़ी थी। दिल्ली के एक बड़े होटल में कम्पनी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पत्रिका बंटनी थी सो किसी भी तरह पत्रिका छापनी ही थी।
इस अंक के लिए आवरण डिज़ाइन, आन्तरिक सज्जा और अनेक चित्र-कार्टून बनाने बाद भी कई अंकों के लिए मैंने पूरी लगन से काम किया। पारिश्रमिक के लिए भी कहता रहा, याद दिलाता रहा। भुगतान के लिए अनेक बार अश्वासन मिले। यहां तक कहा गया कि चैक तैयार है, ले जाएं। इसके लिए सीलिंग के दौरान नोएडा स्थान्तरित हुए दफ़्तर में भी मुझे ३ बार बुलाया गया। लेकिन उस चैक पर मालिक साब यानी विजय दीक्षित के हस्ताक्षर कभी नहीं हुए सो मुझे कभी वह चैक मिला भी नहीं।
किन्हीं कारणों से एस.एन. विनोद की विदाई हो गयी। अब नये सम्पादक आये मेरे एक अन्य मित्र विनोद श्रीवास्तव जो काफ़ी पहले दिल्ली प्रेस में काम करते थे और बाद में मासिक पत्रिका ’मेरी संगिनी’ के सम्पादक रहे। पहले इन्होंने कहा कि पिछला भुगतान हो जाएगा, काम शुरू करो। बाद में कहा कि मालिक से बात हो गयी है, फ़िर कहा कोशिश करूंगा। खैर, सामग्री छपने के ३ महीने बाद भुगतान करने के अपने नियम के तहत वे काम कराते रहे। बाद में कई बार मेरा चैक ’तैयार’ हुआ पर मालिक के दस्तखत न होने से मिला नहीं, हालांकि मुझे चैक लेने के लिए २-३ बार बुलाया भी गया। यों दिल्ली जैसे शहर में डाक, कूरियर या सन्देशवाहक के द्वारा बड़ी आसानी से कोई कागज-दस्तावेज भेजा जा सकता है। पर भेजने की नीयत भी तो होनी चाहिए।
अपने मेहनताने को लेकर मैं काफ़ी सक्रिय रहा। विजय दीक्षित से मिलने की हर कोशिश बेकार रही। अनेकों बार डिफ़ेंस कॉलोनी स्थित दफ़्तर में मैंने सम्बन्धित बिल दिये, मालिक को अनेक बार ई-मेल किए पर कोई नतीजा नहीं निकला। मेरा कुल पारिश्रमिक ३४४५०.०० रुपये (चौंतीस हजार चार सौ पचास रुपये) है जो अनेक प्रयासों के बाद भी आज तक नहीं मिला। यह मेहनताना सन २००६, २००७ और २००९ का है।
विजय दिक्षित
कुछ लोगों को अखबार-पत्रिका निकालने की बीमारी चार पैसे जेब में आते ही लग जाती है। जल्दी ही वे अपना मीडिया हाउस बना लेना चाहते हैं ताकि अपने अनेक उल्टे-सीधे काम कराने या धोंस जमाने के लिए उसका इस्तेमाल कर सकें।
मैं यही चाहता हूं कि मेरे जैसे फ़्रीलांस काम करने वाले मित्र ऐसे लोगों से जरूरत से ज्यादा सावधान रहें और ऐसे लोगों को बेनकाब भी करें ताकि अन्य मेहनती लोग इनके शोषण के शिकार न हों।
इसी तरह और भी अनुभव हुए हैं- नौकरी और फ़्रीलांस काम करने के दौरान, फ़िर बताऊंगा।
----- क्लिक मारकर इन्हें देखिए --------
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शनिवार, 22 जनवरी 2011

गैस चोरी

इस तरह होती है ईण्डेन के रसोई गैस सिलेण्डरों में धड़ल्ले से हेरा फ़ेरी और उपभोक्ता को २ से ५ किलोग्राम तक एलपीजी वजन में कम मिलती है।
© T.C. Chander शिकायत बोल
गैस चोरी

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

गैस चोरी

ईण्डेन गैस की धड़ल्ले से चोरी
इस तरह होती है रसोईगैस की धड़ल्ले से चोरी











































और गैस बुक कराने के कई दिन बाद भी जब ग्राहक के घर गैस सिलेण्डर नही पहुंचता तो दिल्ली जैसे शहर यानी राजधानी में भी खाना इस तरह लकड़ी जलाकर बनाना पड़ता है।

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

कार्टून चोर


कार्टूनपन्ना (sulekha.com) में प्रदर्शित कई कार्टून चुराकर भारत के हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी ने अपने एक कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में उपयोग किया, वह भी मनमाने ढंग से फ़ेरबदल करके। इस बारे में बारबार लिखने-सम्पर्क करने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ। महीनों बाद जब इण्टरनेट पर मैंने लिखा और काफ़ी लोगों को ई-मेल भेजे तब चैनल के मुखिया का एक सन्देश आया जिसमें खेद व्यक्त किया गया था और मेहनताने/क्षतिपूर्ति के रूप में धन  भेजने को कहा था।
इस बात को भी कई माह बीत चुके हैं। यह हाल है आर्थिक रूप से सम्पन्न टीवी चैनल का जो अपने कर्म्चारियों को लाखो रुपये वेतन दे देता है, विज्ञापन आदि से कमाता भी है। साथ ही और भी व्यवसाय होंगे। मगर कार्टून चुराकर उपयोग करना ठीक लगता है। किसी रचनाकार की रचना का बिना अनुमति उपयोग करने मे जरा भी शर्म नहीं आती। ऐसा ही एक और उदाहरण है- मध्य प्रदेश से प्रकाशित होने वाले रंगीन हिन्दी दैनिक पीपुल्स समाचा का, इसमें भी मेरा एक कार्टून चुराकर छापा गया। कई बार पत्र लिखने पर भी चुप्पी छाई हुई है।
• चित्र : हिन्दी समाचार टीवी चैनल सीएनईबी में चुराए कार्टूनों की पृष्ठभूमि
कार्टून चोरी (दखलंदाजी में प्रकशित १७.०५.१०)

यहां दिया मेरा बनाया एक कार्टून मध्य प्रदेश से प्रकाशित हो रहे हिन्दी दैनिक अखबार पीपुल्स समाचार ने थोड़ा-सा बदलाव करके अपने कॉलम गुगली में (नीचे दिया लिन्क http://cartoonistchander.blogspot.com हटा कर) १५ मई २०१० को पृष्ठ ४ पर बिना अनुमति/बिना सूचना छाप दिया। यह गुस्ताखीमाफ़  में नियमित रूप से छपने वाले मेरे कार्टूनों में से एक है।
सम्पन्न-समर्थ होने पर भी मुफ़्त का माल उपयोग करने की प्रवृत्ति निन्दनीय है और किसी भी रचनाकार के अधिकारों का हनन तथा कॉपीराइट का उल्लंघन है।
चन्दर
देखें- १. छपा कार्टून २. मूल कार्टून (बड़े आकार में देखने के लिए छवियों पर क्लिक करें)

बुधवार, 12 जनवरी 2011

डिलीवरी

एजेंसी वालों का कहना है कि हलवाई को डिलीवरी दे चुके हैं, छोटे सिलेण्डर भरने वालों को देने के बाद हमारा नम्बर है।

आपके यहां भी ऐसा ही होगा। यह लिन्क भी क्लिक करके देखें-पढ़ें-
गैस 

कार्टून और चुटकुलों का आनन्द लेने के लिए यहां क्लिक करें।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

कार्टून व्यथा

दैनिक जागरण ने क्यों छापा कार्टून
छवि पर क्लिक कर बड़ा करके देखें




















मैं एक फ्रीलांस कार्टूनिस्ट हूँ दो चार पत्र-पत्रिकाओं में कार्टून देता हूँ और उसी मेहनताने से मेरा काम चलता है। पर जब कई समाचार पत्र मेरे कार्टून मेरी इजाजत और मेरे नाम के बिना धड़ल्ले से छाप लेते हैं यह देखकर दुःख होता है। हम जैसे असंगठित पढ़ेलिखे मजदूर कुछ नहीं कर पाते। कोर्ट-कचहरी में कॉपीराइट का मामला उठाकर सालों तक धन और समय बरबाद करना भी सभी के वश की बात नहीं। 
इन्टरनेट का प्रयोग कुछ लोग  क्या और कैसे करते हैं, यह इसी चीज का एक नमूना है।  कार्टून चुराकर छापना, ताकि मेहनताना न देना पड़े। यह प्रवृत्ति छोटे-बडए तमाम प्रकाशनों में है। इस समाज में संवेदनशील कलाकारों की जगह नहीं है, शायद समाज को बेईमान नेता, अफ़सर, व्यापारी और अपराधियों की ज्यादा जरूरत है। वसे भी कार्टून कला को प्रोत्साहन देने वाले सम्पादकों की प्रजाति ही लुप्तप्राय है, अब कमान हर चीज को बाज़ार बनाने वालों के हाथ में है। मालिक और बाजार के बाज़ीगर सम्पादक हो गये हैं और ये लोग ही पठनीय (?) सामग्री पर हावी रहते हैं। ऐसे में हेराफ़ेरी ही होगी। कार्टून चाहिए जरूर पर फ़ोकट में और कोई कुछ कहे भी नहीं। यह स्थिति सचमुच शर्मनाक है!
श्याम जगोता, नयी दिल्ली 

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